





रंजना झा
प्रेमरस संग बहे मलय समीर,
चंचल चितवन करे मन अधीर।
हरित अवनि, श्यामल अंबर,
मुदित प्रकृति, पुलकित खग-नर।
कुसुम-कली सुवासित अनुपम,
रस-खेल करें अली उपवन-उपवन।
छाई पात-पात पर तरुणाई,
उन्मादित तृण, अवनि हरषाई।
रिमझिम-रिमझिम सावन बरसे,
व्याकुल हिया प्रियतम को तरसे।
तृप्त हुई वसुधा का पोर-पोर,
मन की बात न जाने चितचोर।
लट बिखराए बदरा छाए,
मधुमास-सी ऋतु मन हरषाए।






