




डॉ. गौरीशंकर निमिवाळ
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में स्वतंत्र राजस्थानी विभाग की स्थापना की मांग को लेकर 30 मार्च 2026, राजस्थान स्थापना दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भूख हड़ताल की। युवा आईराज सिंह और हेमेन्द्र सिंह तेना के नेतृत्व में संयोजित इस आंदोलन में छात्र लोकेंद्र सिंह और छात्रा पूजा छह दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह रहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस दौरान कोई ठोस संज्ञान नहीं लिया। यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है, आखिर छात्रों को ऐसा कठोर कदम उठाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा?
वास्तविक मुद्दा यह है कि राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित राजस्थान विश्वविद्यालय में आज तक राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र विभाग स्थापित नहीं हो पाया है। विद्यार्थियों का कहना है कि वे अपने ही प्रदेश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में अपनी मातृभाषा के अध्ययन-अध्यापन के अधिकार के लिए संघर्ष करने को विवश हैं। पिछले 15 वर्षों से राजस्थान अध्ययन केंद्र के माध्यम से स्ववित्त पोषित योजना के तहत एम.ए. राजस्थानी साहित्य और शोध कार्य संचालित हो रहा है, जिसमें सैकड़ों विद्यार्थियों ने लाखों रुपये शुल्क देकर अध्ययन किया है। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि प्रदेश की मातृभाषा के लिए स्ववित्त पोषित व्यवस्था है, जबकि अन्य भाषाओं के लिए नियमित विभाग उपलब्ध हैं।
राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए यह आवश्यक है कि उसे शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में सम्मानजनक स्थान मिले। प्रश्न यह है कि राजस्थान की उच्च शिक्षा व्यवस्था में राजस्थानी भाषा के लिए युवाओं को संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? क्यों राजस्थान के युवाओं को अपनी ही मातृभाषा से विच्छेद की स्थिति में धकेला जा रहा है?
वर्तमान में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर और मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में स्वतंत्र राजस्थानी विभाग संचालित हैं। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर में पिछले नौ वर्षों से स्वपोषित योजना के अंतर्गत राजस्थानी विभाग चल रहा है। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर, वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, सीकर में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर राजस्थानी साहित्य का अध्ययन कराया जा रहा है। ऐसे में राजस्थान विश्वविद्यालय का इस सूची से बाहर होना चौंकाने वाला है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 343 से 351 तक भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की व्यवस्था करता है। आठवीं अनुसूची में अब तक 22 भाषाएं शामिल की जा चुकी हैं। राजस्थानी भाषा लंबे समय से इसमें शामिल किए जाने के लिए संघर्षरत है। 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, जो आज भी लंबित है। अनुच्छेद 345 के अंतर्गत राजस्थान सरकार राजस्थानी को राजभाषा घोषित कर सकती है, किंतु इस दिशा में ठोस पहल का अभाव दिखाई देता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा पर जोर देती है, परंतु आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी विभाग का न होना नीतियों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है। विश्वविद्यालय में हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत, फ्रेंच और स्पेनिश सहित अनेक भाषाओं के विभाग संचालित हैं, जबकि राजस्थानी के लिए विद्यार्थियों को 55-60 हजार रुपये शुल्क देना पड़ता है, जबकि अन्य विषयों की फीस मात्र 5-6 हजार रुपये है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए यह स्थिति असहनीय है।
स्वतंत्र विभाग के अभाव में शोधार्थियों को अकादमिक और प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि राजस्थानी भाषा और साहित्य में रोजगार की संभावनाएं भी मौजूद हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
4 अप्रैल को राजस्थान विश्वविद्यालय के सिंडिकेट सदस्य और सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र से विधायक गोपाल शर्मा ने आंदोलनरत छात्रों से संवाद किया और जूस पिलाकर भूख हड़ताल समाप्त करवाई। उन्होंने लिखित रूप में राजस्थान सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन से समन्वय कर स्वतंत्र राजस्थानी विभाग स्थापित करवाने की प्रतिबद्धता जताई।
छह दिनों तक छात्र लोकेंद्र सिंह और छात्रा पूजा का भूख हड़ताल पर बैठना राजस्थानी भाषा के प्रति युवाओं के प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक है। राजस्थान का युवा चाहता है कि प्रदेश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में राजस्थानी विभाग स्थापित हो, ताकि भाषा, साहित्य, संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन हो सके। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजस्थान सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग पर क्या ठोस कदम उठाते हैं।
(लेखक राजस्थानी छात्र मोर्चा, राजस्थान के प्रदेश संयोजक हैं)







