







पद्मेश सिहाग.
कभी हनुमानगढ़ के सिनेमाघरों की ऊंची दीवारों पर गणेश सोलंकी के बनाए फिल्मी पोस्टर दूर से ही लोगों का ध्यान खींचते थे। बड़े-बड़े कैनवास पर उभरते नायक-नायिकाओं के चेहरे, चमकदार रंग और आकर्षक रेखाएं उनके हाथों की कला का ऐसा जादू बिखेरती थीं कि सिनेमा देखने से पहले लोग पोस्टरों को निहारने के लिए ठहर जाते थे। वह दौर था जब फिल्मों का प्रचार रंगों और कूची से होता था और गणेश सोलंकी उन हाथों में से एक थे, जो इन पोस्टरों को जीवंत बना देते थे।
समय बदला, सिनेमाघरों के पोस्टरों की जगह आधुनिक प्रचार माध्यमों ने ले ली, लेकिन गणेश सोलंकी की कूची नहीं रुकी। उनका कैनवास अब और विस्तृत हो गया। शहर की दीवारें, मंदिर, सार्वजनिक स्थल और कल्याण भूमि उनके रंगों के नए ठिकाने बने। आज हनुमानगढ़ और आसपास के इलाकों में जब किसी दीवार पर सजीव देवी-देवताओं के चित्र, लोकजीवन के दृश्य या रंगों से उकेरी गई कोई कलाकृति लोगों को बरबस अपनी ओर खींचती है, तो उसके पीछे अक्सर गणेश सोलंकी की मेहनत और कल्पना दिखाई देती है।
एक समय जिन रंगों से वे फिल्मों के पोस्टरों में आकर्षण और उत्सुकता पैदा करते थे, उन्हीं रंगों से अब वे शहर की दीवारों और सार्वजनिक स्थलों को सांस्कृतिक पहचान दे रहे हैं। उनके लिए चित्रकारी महज रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि शहर को सुंदर बनाने और अपनी संवेदनाओं को समाज तक पहुंचाने का माध्यम रही है। औपचारिक कला-शिक्षा के अभाव में वर्षों की साधना, अनुभव और रंगों पर असाधारण पकड़ ने उन्हें हनुमानगढ़ की कला-स्मृति का ऐसा नाम बना दिया है, जिसकी पहचान किसी पुरस्कार या बड़े मंच से नहीं, बल्कि उनके बनाए चित्रों से होती है।
गणेश सोलंकी की कला की खासियत यही है कि वह दीर्घाओं की चारदीवारी में कैद नहीं है। वह आम आदमी के बीच है, सड़क किनारे की दीवारों पर, मंदिरों में, सार्वजनिक स्थलों पर और उन जगहों पर जहां रोज हजारों आंखें उसे देखती हैं। उनकी कूची ने हनुमानगढ़ की दीवारों को केवल रंगीन नहीं किया, बल्कि उनमें स्मृतियां, आस्था, लोकजीवन और शहर की अपनी एक दृश्य पहचान भी रची है।
हनुमानगढ़ की कला-संस्कृति और सार्वजनिक स्थलों को अपने रंगों और रेखाओं से समृद्ध करने वाले चित्रकार गणेश सोलंकी का जन्म 26 अगस्त 1969 को हनुमानगढ़ में हुआ। औपचारिक शिक्षा के रूप में उच्च प्राथमिक स्तर तक अध्ययन करने के बाद उन्होंने चित्रकला को ही अपने जीवन और कर्म का आधार बना लिया।
शुरुआती दौर में उन्होंने शिवमंदिर सिनेमा के लिए विशाल फिल्म पोस्टर तैयार किए। इसके बाद वे जयपुर भी गए और वहां चित्रकारी के क्षेत्र में कार्य किया। वर्ष 1987 से वे लगातार चित्रकार के रूप में सक्रिय हैं और पिछले कई दशकों से अपनी कला के माध्यम से समाज और शहर को सुंदर बनाने में योगदान दे रहे हैं।
गणेश सोलंकी के कला-कर्म का एक उल्लेखनीय अध्याय हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय स्थित कल्याण भूमि को सजाने-संवारने का है। उन्होंने अपने श्रम, प्रतिभा और सृजनात्मक दृष्टि से इस स्थान को कलात्मक स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी चित्रकारी ने न केवल स्थान की सुंदरता बढ़ाई, बल्कि कला को जनसामान्य के बीच पहुंचाने का भी कार्य किया।
हनुमानगढ़ के साथ-साथ संगरिया, भादरा, नोहर और पीलीबंगा के अनेक सार्वजनिक स्थलों और मंदिरों में भी गणेश सोलंकी की चित्रकारी आज दिखाई देती है। उनके बनाए चित्र वर्षों से इन स्थानों की सांस्कृतिक और दृश्य पहचान का हिस्सा बने हुए हैं। बिना किसी बड़े संस्थागत मंच या औपचारिक कला-प्रशिक्षण के, अपने अनुभव और निरंतर साधना से उन्होंने जिस तरह अपनी अलग पहचान बनाई, वह प्रेरणादायी है।
गणेश सोलंकी जैसे कलाकार केवल चित्र नहीं बनाते, वे शहर की स्मृतियों, संस्कृति और सौंदर्य को रंगों में सुरक्षित करते हैं। उनका योगदान किसी एक स्थान या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि हनुमानगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के सार्वजनिक जीवन में उनकी कला की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
सुविख्यात मूर्तिकार रामकिशन ‘अडिग’ कहते हैं, ‘गणेश सोलंकी की चित्रकला की एक विशिष्ट विशेषता रंगों की गहरी समझ और उन पर असाधारण पकड़ है। वे आवश्यकता के अनुरूप तुरंत मनचाहा रंग तैयार कर लेने की क्षमता रखते हैं। रंगों के संयोजन, उनकी तीव्रता और भावानुकूल प्रयोग की उनकी समझ उनकी चित्रकला को प्रभावशाली बनाती है। लंबे समय की साधना और अनुभव ने उन्हें रंगों के साथ ऐसा आत्मीय रिश्ता दिया है कि वे अपनी कल्पना को सहजता से कैनवास और दीवारों पर साकार कर लेते हैं।’
गणेश सोलंकी ने अधिकांशतः धार्मिक विषयों पर चित्रकारी की है। देवी-देवताओं और धार्मिक प्रसंगों को उन्होंने अपनी कला का प्रमुख विषय बनाया, लेकिन उनकी रचनात्मक दृष्टि केवल धार्मिक चित्रों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने लोकजीवन, लोकपरंपराओं और आम जनजीवन को भी अपनी चित्रकारी का विषय बनाया है। इस तरह उनकी कला में जहां आस्था और आध्यात्मिकता के रंग दिखाई देते हैं, वहीं लोकजीवन की सहजता, जीवंतता और सांस्कृतिक विविधता भी उतनी ही खूबसूरती से अभिव्यक्त होती है।







