





ग्राम सेतु साहित्य डेस्क
कुछ कवि अपने समय में केवल कविताएँ नहीं लिखते, वे अपने भूगोल की आत्मा को शब्द देते हैं। वे इतिहास के धूल-धूसरित पन्नों को वर्तमान की चेतना से जोड़ते हैं और लोकजीवन की साधारण-सी प्रतीत होने वाली अनुभूतियों को असाधारण साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। ओम पुरोहित ‘कागद’ ऐसे ही कवि थे। 12 अगस्त 2016 को उनके निधन के साथ राजस्थान ने केवल एक कवि नहीं खोया, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति का एक सजग प्रहरी भी खो दिया। पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना उस साहित्यिक दृष्टि को याद करना है जिसने मिट्टी, मनुष्य और इतिहास को कविता का सबसे विश्वसनीय आधार बनाया।
प्रख्यात साहित्यकार नीरज दइया ने एक बार ओम पुरोहित ‘कागद’ को ‘वक्त के साथ आगे बढ़ने वाला कवि’ कहा था। इस छोटे-से वाक्य में कागद के संपूर्ण रचनात्मक व्यक्तित्व की व्याख्या निहित है। वे आधुनिक थे, किंतु आधुनिकता के मोह में अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख नहीं हुए। वे परंपरा के कवि थे, पर परंपरा के बोझ तले दबे हुए नहीं। उनकी कविता में अतीत स्मृति बनकर आता है, वर्तमान प्रश्न बनकर और भविष्य आशा बनकर।
कागद का जीवन जितना सरल था, उनकी दृष्टि उतनी ही व्यापक। वे चंद्र सिंह बिरकाळी जैसे वरिष्ठ कवि के प्रिय शिष्यों में रहे। धोरों पर कविता का पाठ करने वाले कवियों की परंपरा में उनकी उपस्थिति यह बताती है कि वे लोक और साहित्य के बीच की दूरी को कभी स्वीकार नहीं करते थे। ‘जागती जोत’ के संपादक के रूप में उन्होंने साहित्यिक चेतना का संवाहक बनने का कार्य किया। राजस्थान क्रिकेट संघ की समिति से जुड़े रहकर उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि साहित्यकार का जीवन केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होता।
ज्योतिष के प्रति उनकी आस्था थी, किंतु उससे कहीं अधिक भरोसा उन्हें मनुष्य की सृजनशीलता पर था। वे कहा करते थे, ‘रचनाकार को जमीनी होना चाहिए, क्योंकि वही उसकी सबसे बड़ी थाती है।’ यही विचार उनकी संपूर्ण काव्य-दृष्टि का आधार है। उनकी कविता किसी कृत्रिम बौद्धिकता से नहीं, बल्कि जीवन की प्रत्यक्ष अनुभूतियों से जन्म लेती है। वे जानते थे कि जो कवि अपनी धरती से कट जाता है, उसकी भाषा भी धीरे-धीरे अपनी जीवंतता खो देती है।
ओम पुरोहित ‘कागद’ की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धियों में कालीबंगा पर लिखी गई उनकी कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लगभग बीस कविताओं की इस श्रृंखला ने राजस्थानी और हिंदी साहित्य में एक नया विषय, नया दृष्टिकोण और नई संवेदना जोड़ी। भारतीय कविता में इतिहास पर बहुत लिखा गया है, किंतु किसी पुरातात्विक स्थल को इतनी आत्मीयता और सांस्कृतिक दृष्टि से कविता का केंद्र बनाने का प्रयास विरल है।
कागद के लिए कालीबंगा केवल ईंटों और खंडहरों का नगर नहीं था। वह सभ्यता की स्मृति थी, सरस्वती की मौन धारा थी, मनुष्य के विकास की कहानी थी। बचपन में पुरातात्विक खुदाई को देखना, वहाँ से निकलने वाले अवशेषों के प्रति जिज्ञासा और अपने क्षेत्र के इतिहास से गहरा भावनात्मक संबंध, इन सबने उनके भीतर एक ऐसी सर्जनात्मक बेचॅनी पैदा की जो आगे चलकर कविता में रूपांतरित हुई। उनकी कालीबंगा संबंधी कविताएँ इतिहास का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि इतिहास से संवाद करती हैं।
इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरों को लेकर उनकी चिंता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। वे मानते थे कि भारत का अतीत अत्यंत समृद्ध है, किंतु विडंबना यह है कि इसी समृद्धि के कारण हम अपनी विरासत के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं रह पाए। उन्होंने प्रश्न उठाया कि संभव है कालीबंगा के निवासी भी अपने नगर के ऐतिहासिक महत्व को पूरी तरह न जानते हों, पर इससे उसका महत्व कम नहीं हो जाता। यह प्रश्न केवल कालीबंगा का नहीं, बल्कि उस समाज का है जो विकास की दौड़ में अपनी स्मृतियों को पीछे छोड़ता जा रहा है।
राजस्थानी भाषा के प्रश्न पर कागद की दृष्टि भावनात्मक होने के साथ-साथ तार्किक भी थी। उनका स्पष्ट मत था कि करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली, समृद्ध साहित्यिक परंपरा से सम्पन्न राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिए। वे इस आंदोलन की कमजोरियों से भी परिचित थे। उनका कहना था कि आंदोलन की दिशा सही है, किंतु वह राजनीतिक स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं बना सका। यह आत्मालोचन उनकी बौद्धिक ईमानदारी का परिचायक है।
राजस्थानी साहित्य को लेकर वे गहरे आशावादी थे। उनका विश्वास था कि यह भारतीय भाषाओं के सबसे समृद्ध साहित्यिक संसारों में से एक है। वे मालचंद तिवाड़ी, मंगत बादळ, उपेंद्र उम्मट, बुलाकी शर्मा, मिठेश निर्माेही, ज्योतिपुंज, मुकुट मणिराज, भरत ओळा, सत्यनारायण सोनी, रामस्वरूप किसान, डॉ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’ और विनोद स्वामी जैसे रचनाकारों का उल्लेख करते हुए अपनी पीढ़ी की उपलब्धियों पर संतोष व्यक्त करते थे। साथ ही वे एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाते थे, अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है, लेकिन उसे खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या घट रही है। उनके अनुसार किसी भी भाषा का भविष्य केवल लेखकों से नहीं, बल्कि उसके पाठकों से तय होता है।
कागद राजस्थानी साहित्य की शक्ति उसके यथार्थ में देखते थे। थार का कठोर जीवन, अकाल, पानी का संकट, श्रम, संघर्ष और लोकजीवन की जिजीविषा, ये सब उनकी दृष्टि में साहित्य की प्राणवायु थे। शायद इसी कारण उनकी अपनी कविताओं में भी कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक ऊष्मा दिखाई देती है। वे लोक का रोमानीकरण नहीं करते, बल्कि उसके संघर्ष और सौंदर्य दोनों को समान संवेदना के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
राजस्थानी और हिंदी दोनों भाषाओं में उनका रचना-संसार अत्यंत समृद्ध है। राजस्थानी में ‘अंतस री बळत’, ‘बात तो ही’, ‘कुचरण्यां’ और ‘पंचलड़ी’ जैसे काव्य-संग्रह तथा हिंदी में ‘धूप क्यों छेड़ती है’, ‘आदमी नहीं है’ और ‘थिरकती है तृष्णा’ जैसी कृतियाँ उनकी साहित्यिक साधना की साक्षी हैं। बाल साहित्य में ‘मीठे बोलों की शब्दपरी’ और ‘जंगल मत काटो’ जैसी रचनाएँ उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय देती हैं। प्रतिनिधि संकलन रेत पर नंगे पाँव में उनकी कविताओं का शामिल होना तथा सुधींद्र पुरस्कार और गणेशीलाल व्यास पुरस्कार से सम्मानित होना उनके साहित्यिक अवदान की औपचारिक स्वीकृति है।
लेकिन किसी भी बड़े रचनाकार का मूल्यांकन केवल पुरस्कारों से नहीं होता। ओम पुरोहित ‘कागद’ का वास्तविक महत्व इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने कविता को अपने समय की सांस्कृतिक जिम्मेदारी माना। उन्होंने इतिहास को वर्तमान से जोड़ा, लोक को साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित किया और मनुष्य में अपनी अटूट आस्था बनाए रखी। उनकी कविता हमें यह सिखाती है कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी मिट्टी से दूर होना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को नए समय की रोशनी में पुनः पहचानना है।
आज, जब उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें स्मरण करते हैं, तब यह एहसास और गहरा हो उठता है कि कवि शरीर से विदा हो सकता है, किंतु उसकी भाषा, उसकी संवेदना और उसके प्रश्न कभी नहीं मरते। कागद आज भी कालीबंगा की प्राचीन ईंटों के बीच, थार की हवाओं में, राजस्थानी भाषा की आत्मा में और उन पाठकों के मन में जीवित हैं जो साहित्य को केवल शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति मानते हैं।
ओम पुरोहित ‘कागद’ का साहित्य आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास देता रहेगा कि अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ शब्द ही सबसे दूर तक जाता है, और इतिहास से संवाद करती हुई कविता ही समय की सबसे विश्वसनीय साक्षी बनती है।







