






पूर्व लोक अभियोजक दिनेश कुमार दाधीच बताते हैं कि सबूत, प्रक्रिया और मानवीय कारक किस तरह किसी मामले के नतीजे को प्रभावित करते हैं।
अमरपाल सिंह वर्मा
उस दिन हनुमानगढ़ की नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटांसेज एक्ट (एनडीपीएस) अदालत में गवाही चल रही थी। मामला मादक पदार्थों की बरामदगी से जुड़ा था। एक पुलिस कांस्टेबल को इस मामले में अहम गवाह माना गया था, इसलिए वह गवाही के लिए कटघरे में खड़ा था। सरकारी वकील ने उससे सवाल किए। कांस्टेबल ने जवाब दिया, ‘मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता। उस समय मैं पेशाब करने के लिए वहां से चला गया था।’
अदालत में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। यह वही मामला था जिसमें इसी पुलिस कांस्टेबल को मादक पदार्थों की बरामदगी का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था। उस समय विशेष लोक अभियोजक के रूप में मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता दिनेश कुमार दाधीच को आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है। उन्होंने इस संवाददाता को बताया कि एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे पूरा मामला हाथ से निकल गया हो। हालांकि, दूसरे पुष्टिकारक साक्ष्यों के सहारे वे मामले को संभालने में सफल रहे।
यह केवल एक अलग-थलग घटना नहीं है। यह उस दुनिया की एक झलक भी देती है जिसमें एक लोक अभियोजक रोज काम करता है, एक ऐसी दुनिया जहां हर मामला केवल कानून का मामला नहीं होता, बल्कि कानूनी व्यवस्था, प्रक्रियात्मक नियमों और मानवीय व्यवहार का जटिल मेल होता है।
दाधीच ने 2001 में एलएलबी की और उसी साल अप्रैल में आपराधिक मामलों की वकालत शुरू कर दी। अपने लंबे कानूनी अनुभव के आधार पर उन्हें दो अलग-अलग मौकों पर लोक अभियोजक नियुक्त किया गया। पहली बार 2009 से 2014 तक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (प्रथम) की अदालत में विशेष लोक अभियोजक के रूप में और फिर 2019 से 2025 तक विशेष अदालत (एनडीपीएस एक्ट मामलों) में। फिलहाल वह निजी तौर पर वकालत कर रहे हैं।
इस दौरान उन्होंने हजारों मामलों को संभाला। लोक अभियोजक के काम में मौजूद मुश्किलों और चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए इस संवाददाता ने दाधीच से बातचीत की।
450 मामले, एक अभियोजक
यह स्थिति आम है। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है। पद खाली नहीं हैं। हर अदालत का अपना निर्धारित लोक अभियोजक होता है।
राजस्थान में लोक अभियोजकों की नियुक्ति दो तरीकों से होती है। एक, जब पद खाली होते हैं तो प्रतियोगी परीक्षा के जरिए नियुक्ति की जाती है। दूसरे, राज्य सरकार कानूनी वकालत के अनुभव के आधार पर किसी वकील को निश्चित अवधि के लिए नियुक्त करती है। अनुभव के आधार पर नियुक्त होने वाले वकीलों के सामने अपनी अलग तरह की चुनौतियां होती हैं।
दाधीच बताते हैं कि ऐसे लोक अभियोजकों को तुलनात्मक रूप से कम पारिश्रमिक मिलता है। मासिक वेतन और दैनिक प्रोत्साहन राशि मिलाकर उनकी कुल आय करीब 36,000 से 39,000 रुपये होती है। इसके मुकाबले नियमित सरकारी वकीलों का वेतन एक लाख से दो लाख रुपये तक हो सकता है।
फर्क सिर्फ वेतन का नहीं है। अनुभव के आधार पर नियुक्त कोई लोक अभियोजक जब अदालत में आता है तो उसके सामने तुरंत 400 से 450 मामलों का बोझ होता है। दूसरी तरफ उसके सामने लगभग इतनी ही संख्या में बचाव पक्ष के वकील होते हैं, जबकि उसकी ओर से अकेला अभियोजक खड़ा होता है। यह असंतुलन सिर्फ काम के बोझ को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि न्याय दिए जाने की गुणवत्ता पर भी असर डालता है।
इन मामलों में हत्या, बलात्कार, अपहरण, एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध और दूसरे गंभीर अपराध शामिल होते हैं। हर मामले की तैयारी के लिए अलग तरीका अपनाना पड़ता है, लेकिन समय सीमित होता है। कई बार जिस दिन मामले में बहस होनी होती है, उसी दिन केस की फाइल अभियोजक को मिलती है।
अदालत में आमतौर पर लोक अभियोजक की भूमिका को मुख्य रूप से अदालत में बहस करने तक सीमित माना जाता है। लेकिन दाधीच ने इसकी एक अलग तस्वीर पेश की। उन्होंने बताया कि उनका आधा समय बहस करने में नहीं, बल्कि मामलों के प्रबंधन में चला जाता हैकृकौन-सा मामला पहले लिया जाए, किन मामलों में गवाह मौजूद हैं और किन मामलों में अगली तारीख लेनी है।
ज्यादातर अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पहले से ही बहुत अधिक है। गवाहों का अदालत में उपस्थित न होना, पुलिस अधिकारियों के तबादले और फोरेंसिक रिपोर्ट मिलने में देरीकृये सब मिलकर एक ऐसा चक्र बना देते हैं जिसमें मुकदमे वर्षों तक खिंचते रहते हैं।
कई बार एक ही गवाह का बयान दर्ज करने में पूरा दिन निकल जाता है। एक लोक अभियोजक को अक्सर एक साथ दर्जनों मामलों को संभालना पड़ता है। गवाहों की गैर-मौजूदगी, बार-बार पड़ने वाली तारीखें और लगातार बढ़ती केस फाइलें उस “बहस” के पीछे की असली तस्वीर हैं, जो अदालत के भीतर दिखाई देती है।
लोक अभियोजक का काम मूल रूप से पुलिस की जांच पर टिका होता है। वह स्वतंत्र रूप से जांच नहीं करता, बल्कि पुलिस द्वारा तैयार की गई चार्जशीट और जुटाए गए सबूतों के आधार पर अपना मामला अदालत में पेश करता है।
दाधीच के मुताबिक, अभियोजन पक्ष की पूरी दलील पुलिस की जांच पर टिकी होती है। अगर उस जांच में कोई खामी या कमी रह गई हो तो ऐसे मामले को अदालत में संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है।
चार्जशीट दाखिल करने से पहले पुलिस अक्सर अभियोजन पक्ष से राय लेती है। इस दौरान लोक अभियोजक केस फाइल की जांच करता है और उसमें मौजूद कमियों की ओर इशारा करता है। हालांकि, हर मामले में उन कमियों को दूर किया ही जाएगा, यह जरूरी नहीं है।
दाधीच ने बताया कि उनके प्रयासों से अभियोजन की समीक्षा की व्यवस्था, जो पहले निचली अदालतों तक ही सीमित थी, उसे एनडीपीएस एक्ट, एससी/एससी एक्ट और पोक्सो एक्ट के मामलों की सुनवाई करने वाली सत्र अदालतों तक भी बढ़ाया गया। इससे कुछ हद तक मामलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ, लेकिन मूल समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
अभियोजन विभाग के अधिकारियों ने इस कदम का विरोध किया था। वे अनुभव के आधार पर नियुक्त लोक अभियोजकों को सत्र अदालतों में यह भूमिका देने के लिए तैयार नहीं थे।
लोक अभियोजक को अक्सर ‘न्याय का प्रतिनिधि’ कहा जाता है। लेकिन व्यवहार में वह राज्य की ओर से वकील की भूमिका निभाता है। दाधीच ने कहा कि हर लोक अभियोजक के मन में यह भावना हो सकती है कि उसका उद्देश्य आरोपी को दोषी ठहरवाना है। लेकिन वास्तव में उसका दायित्व दोषसिद्धि सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि संबंधित तथ्यों को अदालत के सामने रखना है। अंतिम फैसला अदालत करती है। उन्होंने कहा कि कई बार कोई मामला अभियोजक को व्यक्तिगत रूप से कमजोर लग सकता है, फिर भी पेशेवर जिम्मेदारी के तहत उसे राज्य की ओर से पूरी मजबूती के साथ पेश करना पड़ता है। उनके मुताबिक, पेशे की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यही है, वह बिंदु जहां व्यक्तिगत सोच और पेशेवर जिम्मेदारी आमने-सामने आ जाती हैं। हत्या, यौन अपराध और बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई केवल कानूनी कार्यवाही नहीं होती। इनका गहरा भावनात्मक असर भी होता है।
दाधीच ने बताया कि एक बार उन्होंने बलात्कार की एक नाबालिग पीड़िता की गवाही सुनी थी। इसके बाद कई दिनों तक वह ठीक से सो नहीं पाए। ‘अब मैं स्वतंत्र रूप से वकालत करता हूं, लेकिन ऐसे मामलों से दूर रहता हूं। फीस कितनी भी हो, मैं ये मामले नहीं लेता।’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में किसी के पास इतना समय या क्षमता नहीं है कि वह किसी की मानसिक सेहत की चिंता कर सके।
एनडीपीएस प्रक्रिया की तकनीकी पेचीदगियां
मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों का कानून सख्त है, लेकिन इसकी प्रक्रियाएं बेहद तकनीकी हैं। दाधीच बताते हैं कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया के दौरान हुई छोटी-सी गलती भी पूरे मामले को काफी कमजोर कर सकती है।
इसी वजह से कई बार आरोपी तकनीकी आधार पर बरी हो जाते हैं। इससे समाज में नाराजगी पैदा होती है। लोगों को लगता है कि आरोपी ‘बच निकला’, जबकि वे यह नहीं समझते कि कानून ठोस सबूत की मांग करता है और केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
हनुमानगढ़ जिले और आसपास के इलाकों में नशे के स्वरूप में भी बदलाव आया है। पहले अफीम और पोस्त से बने नशीले पदार्थों का चलन अधिक था। अब उनकी जगह हेरोइन और ‘स्मैक’ ने ले ली है। इंजेक्शन के जरिए नशा करने का चलन भी काफी बढ़ गया है, जिससे समस्या और गंभीर हो गई है।
इस पृष्ठभूमि में समाज में गहरा असंतोष है। लोग नशे को खत्म करने और नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों को कड़ी सजा देने की मांग करते हैं। यही वजह है कि जब छक्च्ै एक्ट के किसी मामले में आरोपी तकनीकी आधार पर बरी होता है तो लोगों में गुस्सा पैदा होता है। एक तरफ कानून सबूत मांगता है, दूसरी तरफ समाज नतीजे चाहता है।
किस वजह से मामला बिगड़ गया
दाधीच ने एक ऐसा मामला भी बताया जिसमें प्रक्रिया से जुड़ी एक छोटी-सी असंगति बेहद महंगी साबित हुई। एक महिला आग में बुरी तरह झुलस गई थी। शुरुआत में उसने पुलिस को बताया कि घटना दुर्घटनावश हुई। बाद में मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में उसने अपने ससुराल वालों पर आरोप लगा दिया। इसके बाद उसकी मौत हो गई और मामले को हत्या की जांच में बदल दिया गया। पुलिस ने अदालत में जो चार्जशीट दाखिल की, उसमें केवल मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान शामिल था। जबकि दाधीच को दी गई केस फाइल में दोनों बयान मौजूद थे।
बचाव पक्ष के वकील ने इस विरोधाभास को पकड़ लिया। अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
दाधीच के मुताबिक, यह मामला केवल एक तकनीकी चूक का नहीं था। यह दिखाता है कि सच्चाई, प्रक्रिया और उसे अदालत के सामने पेश करने के तरीके के बीच का अंतर न्याय मिलने की प्रक्रिया को कितनी गहराई से प्रभावित कर सकता है।
नतीजा, लोक अभियोजक की भूमिका केवल दोषसिद्धि सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्याय हो। लेकिन क्या यह हमेशा संभव है?
दाधीच कहते हैं कि हर लोक अभियोजक अदालत के सामने वास्तविक तथ्यों को रखने की कोशिश करता है, लेकिन व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। कई बार सब कुछ सही तरीके से किए जाने के बावजूद नतीजा वैसा नहीं आता, जैसा आना चाहिए। उनके मुताबिक, यही इस पेशे की सबसे बड़ी सच्चाई है।
हर मामला केवल कानून की परीक्षा नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था की भी परीक्षा होता है। न्याय केवल अदालत के भीतर तय नहीं होता। वह जांच, सबूत, गवाहों और प्रक्रिया के संयुक्त परिणाम के रूप में सामने आता है।
इस व्यवस्था के भीतर काम करने वाले लोक अभियोजक हर दिन यह कोशिश करते हैं कि सच्चाई अदालत तक पहुंचे। लेकिन न्याय केवल उनके प्रयासों से तय नहीं होता। यह पूरी प्रक्रिया-श्रृंखला का परिणाम है, जिसमें हर एक कड़ी का मजबूत होना जरूरी है।
(लेखक हनुमानगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार और 101 रिपोर्टर्स के सदस्य हैं जो पूरे देश में ज़मीनी स्तर के रिपोर्टरों का एक नेटवर्क है। यह स्टोरी 101 रिपोर्टर्स के लिए क्राइम एंड पनिशमेंट प्रोजेक्ट के तहत विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सहयोग से प्रकाशित हुई है)






