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हनुमानगढ़ की स्थानीय राजनीति में नगर परिषद चुनाव के बाद शुरू हुई खींचतान अब सीधे कानूनी आर-पार की जंग में तब्दील हो चुकी है। नगर परिषद के पूर्व सभापति और हाल ही में चुनकर आए पार्षद सुमित रणवां की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। घर में पत्नी मंजू रणवां के नगर परिषद अध्यक्ष बनने की खुशियां अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुई थीं कि पुलिस-प्रशासन ने ताबड़तोड़ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि एसपी बी आदित्य के निर्देश पर पुलिस महकमे ने सुमित रणवां की हिस्ट्रीशीट खोल दी है। हालांकि, पुलिस के इस कदम के खिलाफ अब रणवां पक्ष ने भी कानूनी मोर्चा खोल दिया है और पूरी कार्रवाई को राजनीतिक रंजिश व संवैधानिक अधिकारों का खुला हनन करार दिया है।
पुलिस का कहना है कि सुमित रणवां के खिलाफ अलग-अलग थानों में कुल 8 आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, वे लंबे समय से गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्त रहे हैं और क्षेत्र में अमन-चैन व कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए उन पर सतत निगरानी रखना आवश्यक हो गया था।
इसी आधार पर राजस्थान पुलिस नियमों के तहत उनकी हिस्ट्रीशीट खोली गई है। इस कार्रवाई के बाद अब पुलिस उनकी दिनचर्या, मिलने-जुलने वाले लोगों, संपर्कों और शहर में उनकी प्रत्येक गतिविधि का पूरा लेखा-जोखा अपने रिकॉर्ड में दर्ज रखेगी। गौरतलब है कि हिस्ट्रीशीट खोलने से ठीक दो दिन पहले पुलिस ने एक मामले में सुमित रणवां की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए उन पर 100 रुपये का नकद इनाम भी घोषित किया था।
दूसरी ओर, पूर्व सभापति सुमित रणवां ने अपने अधिवक्ता रोहित सिंह खींची के जरिए पुलिस कार्रवाई पर कड़े सवाल खड़े किए हैं और इसे अदालत के नियमों का उल्लंघन बताया है। रणवां का कहना है कि पुलिस की यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को मिले निजता के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का खुला अपमान है।
अधिवक्ता रोहित खींची ने राजस्थान राज्य पुलिस विनियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि नियम 4.9 के तहत निगरानी रजिस्टर नंबर 8 में नाम दर्ज होने पर, नियम 4.4 के अंतर्गत केवल उसी व्यक्ति की हिस्ट्रीशीट खोली जा सकती है जो ‘आदतन अपराधी’ की श्रेणी में आता हो। इसके लिए आवश्यक शर्त यह है कि व्यक्ति को चोरी, डकैती, लूट या जबरन वसूली जैसे गंभीर आपराधिक कृत्यों में अदालत द्वारा कम से कम दो मामलों में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई हो। रणवां पक्ष का दावा है कि उनके मुवक्किल के खिलाफ ऐसा एक भी प्रकरण नहीं है, जिसमें किसी अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया हो। ऐसे में बिना दोष सिद्धि के हिस्ट्रीशीट खोलना पूरी तरह से गैर-कानूनी और दुर्भावनापूर्ण है।
रणवां के अधिवक्ता ने बताया कि जंक्शन थाने के बीट अधिकारी पूनम (1016) द्वारा 4 अक्टूबर 2026 को दिए गए नोटिस में 8 मुकदमों का उल्लेख किया गया था, जो पूरी तरह भ्रामक और हकीकत से परे है। वास्तविकता यह है कि दो मामलों में अदालत से मुकदमा नंबर 677/1994 तथा मुकदमा नंबर 202/2004 (जयपुर) में अदालत द्वारा उन्हें पहले ही बाइज्जत बरी किया जा चुका है। जयपुर के मामले में 24 मार्च 2025 को न्यायालय अपर सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट क्रम संख्या 11 ने संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था।
मुकदमा नंबर 373/2015 में अदालत ने सुनवाई ही समाप्त (ड्रॉप) कर दी है। चार अन्य मुकदमों (166/2011, 67/2013, 90/2018 व 91/2018) में पुलिस जांच के बाद अदालत में खात्मा/अंतिम रिपोर्ट पेश हो चुकी है, जिसे अदालत ने विधिवत स्वीकार कर लिया है।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो सुमित रणवां के अनुसार केवल दो नए मामले हनुमानगढ़ जंक्शन थाने की प्राथमिकी संख्या 603/2025 और टाउन थाने की प्राथमिकी संख्या 666/2026 अभी जांच के स्तर पर हैं। इनमें अभी पुलिस अनुसंधान चल रहा है और अदालत में कोई आरोप या दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
रणवां पक्ष ने पुलिस महकमे पर सत्ता के दबाव में काम करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि टाउन थाने में प्राथमिकी संख्या 666/2026 दर्ज होने के ठीक अगले दिन 9 अक्टूबर 2026 को आनन-फानन में आदेश संख्या 4005 जारी कर सुमित रणवां को भगोड़ा घोषित करते हुए 100 रुपये का इनामी बना दिया गया। इसके तुरंत बाद 14 अक्टूबर को बिना नियमों की परवाह किए हिस्ट्रीशीट खोल दी गई।
रणवां का आरोप है कि जिले के कई थानों में 10 से अधिक संगीन मामलों वाले अपराधी बिना किसी रोक-टोक और बिना हिस्ट्रीशीट के आराम से घूम रहे हैं, जबकि राजनीतिक विद्वेष के चलते केवल उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। अब यह मामला शहर में भारी चर्चा और कानूनी जंग का केंद्र बन गया है।







