




डॉ. मिताली अग्रवाल
अक्टूबर का महीना आते ही हवा में हल्की ठंडक और फिजाओं में त्योहारों की रंगत घुलने लगती है। बाजारों में चूड़ियों की खनक, मेहंदी की खुशबू, चमकीली साड़ियों के रंग और सोलह श्रृंगार की तैयारियां संकेत देती हैं कि करवा चौथ आ गया है। यह पर्व भारतीय समाज में प्रेम, समर्पण, दांपत्य और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखकर अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और मंगल की कामना करती हैं और शाम ढलते ही आसमान में टकटकी लगाए चांद का दीदार करती हैं। यह उत्सव अपार उमंग और उल्लास से भरा होता है, लेकिन इसी जगमगाहट के बीच एक अनकहा पहलू भी है, जिस पर एक संवेदनशील समाज के रूप में विचार करना आवश्यक है।
जब चारों तरफ सुहाग और श्रृंगार का उल्लास चरम पर होता है, तब समाज का एक वर्ग ऐसा भी होता है जो भीतर ही भीतर एकाकीपन से जूझ रहा होता है। ये वे महिलाएं हैं जिनके जीवनसाथी अब उनके साथ नहीं हैं। इनमें वे विधवाएं भी शामिल हैं जिन्होंने असमय अपना सहारा खोया, वे महिलाएं भी हैं जिनका वैवाहिक जीवन किसी मोड़ पर आकर टूट गया, और वे एकल माताएं भी हैं जो अकेले दम पर जीवन और परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ उठा रही हैं। त्योहार हर किसी के जीवन में एक जैसा नहीं आता। जहां किसी के लिए मेहंदी नई खुशियों का रंग लेकर आती है, वहीं किसी के लिए यह बीते हुए कल की दर्दनाक याद बन जाती है। जिस चांद का दीदार किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरता है, वही चांद किसी की आंखों में सूनेपन का कारण बन सकता है।
हमारे पारंपरिक सामाजिक ढांचे में अक्सर किसी महिला की सामाजिक पहचान और उसकी गरिमा को उसके वैवाहिक दर्जे से बांधकर देखा जाता रहा है। पति का साथ होने पर उसे मांगलिक अवसरों के केंद्र में रखा जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश जीवनसाथी के चले जाने के बाद अनजाने में ही सही, उसे ऐसे उत्सवों के हाशिए पर धकेल दिया जाता है। यहां यह बुनियादी सवाल उठता है कि क्या जीवनसाथी के चले जाने से किसी स्त्री का अपना स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है? क्या उसके पास सजने-संवरने, मुस्कुराने, खुश रहने और जीवन का उत्सव मनाने का नैसर्गिक अधिकार बाकी नहीं रहता?
सच्चाई यह है कि ऐसी परिस्थितियों से गुजर रही महिलाओं को किसी की दया या खोखली सहानुभूति की तनिक भी जरूरत नहीं होती। उन्हें जरूरत होती है एक सहज, सम्मानजनक और अपनेपन से भरे वातावरण की। हम उनके अतीत के दर्द को पूरी तरह तो नहीं मिटा सकते, लेकिन अपने आचरण और व्यवहार से यह जरूर सुनिश्चित कर सकते हैं कि वे समाज में खुद को बेगाना या उपेक्षित महसूस न करें।
अकेलापन सिर्फ भीड़ की अनुपस्थिति का नाम नहीं है; यह तब सबसे अधिक चुभता है जब चारों तरफ उल्लास का माहौल हो और किसी को यह महसूस हो कि उस खुशी में उसकी कोई भागीदारी नहीं है। इसके लिए किसी बड़े दिखावे या औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती। अपने पड़ोस या परिवार में किसी अकेली महिला के पास बैठकर केवल दो पल की आत्मीय बातचीत कर लेना, सहजता से उसका हाल-चाल पूछ लेना या उसे बिना किसी शर्त के अपने साथ शामिल कर लेना भी उसके भीतर एक गहरा संबल भर सकता है।
इस विचार का उद्देश्य कतई यह नहीं है कि हम अपनी परंपराओं और उत्सवों के आनंद को कम करें। व्रत रखना, सजना-संवरना और दांपत्य की खुशियां मनाना बेहद सुंदर मानवीय भावनाएं हैं। संतुलन की मांग बस इतनी है कि अपनी खुशियों के बीच हम किसी और के अकेलेपन को नजरअंदाज न करें। करवा चौथ को केवल एक अनुष्ठान तक सीमित न रखकर इसे व्यापक मानवीय संवेदनशीलता, स्नेह और सामाजिक सौहार्द का माध्यम बनाया जाना चाहिए। जब भी आसमान में चांद चमके, तो यह पर्व हमें यह संदेश भी दे कि कोई भी महिला समाज के उजाले से महरूम न रहे। त्योहार की वास्तविक सार्थकता तभी है जब हमारी उमंग किसी के एकाकीपन को और गहरा न बनाए, बल्कि उसमें अपनेपन की गर्माहट घोल दे।





