




डॉ. एमपी शर्मा
जब कोई बीमार व्यक्ति अस्पताल पहुंचता है, तो वह केवल इलाज कराने नहीं आता, बल्कि अपना विश्वास, अपनी उम्मीदें और अपना जीवन चिकित्सक के हाथों में सौंप देता है। दूसरी ओर चिकित्सक अपने ज्ञान, अनुभव और ईमानदार प्रयास से उसे स्वस्थ करने की पूरी कोशिश करता है। इसलिए डॉक्टर और मरीज का रिश्ता केवल उपचार का नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदना और जिम्मेदारी का होता है।
दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में यह भरोसा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। अस्पतालों में विवाद, चिकित्सकों पर हमले, उपचार के बाद हिंसा, सामाजिक माध्यमों पर बिना तथ्यों के आरोप और बढ़ते मुकदमों ने इस रिश्ते को प्रभावित किया है। यह केवल डॉक्टरों या मरीजों की समस्या नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है। आज जटिल शल्य चिकित्सा, हृदय प्रत्यारोपण, कैंसर उपचार और समयपूर्व जन्मे शिशुओं का सफल इलाज संभव है। इसके बावजूद चिकित्सा विज्ञान संभावनाओं का विज्ञान है, पूर्ण गारंटी का नहीं। किसी भी उपचार का परिणाम मरीज की आयु, बीमारी की गंभीरता, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए हर प्रतिकूल परिणाम को चिकित्सकीय लापरवाही मान लेना उचित नहीं है।

डॉक्टर और मरीज के बीच बढ़ती दूरी के पीछे कई कारण हैं। मरीजों की बढ़ती अपेक्षाएं, चिकित्सकों के पास समय का अभाव, संवाद की कमी, इंटरनेट से मिली अधूरी जानकारी, स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता खर्च और कुछ चिकित्सकों का अनैतिक आचरण इस अविश्वास को बढ़ा रहे हैं। कई बार बिना पूरी जांच के सनसनीखेज खबरें भी लोगों के मन में गलत धारणा पैदा कर देती हैं।
यदि कोई चिकित्सक लापरवाही करता है या चिकित्सा नैतिकता का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सभी मानकों के अनुसार उपचार करने के बाद भी यदि मरीज की स्थिति गंभीर होने के कारण प्रतिकूल परिणाम आता है, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता। हर मृत्यु लापरवाही नहीं होती और हर जटिलता चिकित्सक की गलती नहीं होती।
बीमारी केवल मरीज ही नहीं, पूरे परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रभावित करती है। ऐसे समय में दुख और तनाव स्वाभाविक हैं, लेकिन अस्पताल में तोड़फोड़, चिकित्सकों से मारपीट या धमकी किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराई जा सकती। मरीज और उनके परिजनों को भी सही जानकारी देना, उपचार प्रक्रिया को समझना और किसी भी विवाद का समाधान कानूनी व शांतिपूर्ण तरीके से करना चाहिए।
डॉक्टरों को भी मरीज और उनके परिवार से सरल भाषा में संवाद करना चाहिए। बीमारी, उपचार, संभावित जोखिम और विकल्पों की स्पष्ट जानकारी देना उनका दायित्व है। पारदर्शिता और संवेदनशील व्यवहार विश्वास को मजबूत बनाते हैं। वहीं सरकार को अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सक, आधुनिक सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। चिकित्सकों पर हिंसा रोकने के लिए कानून का प्रभावी पालन भी आवश्यक है।
समाचार माध्यमों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी चिकित्सक या अस्पताल को दोषी ठहराने के बजाय संतुलित और प्रमाण आधारित रिपोर्टिंग समाज में विश्वास बनाए रखने में मदद करती है।
चिकित्सक और मरीज एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य यात्रा के साझेदार हैं। यदि दोनों पक्ष संवाद, धैर्य और विश्वास बनाए रखें तथा सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करे, तो यह रिश्ता फिर पहले जैसा सम्मान प्राप्त कर सकता है। एक स्वस्थ समाज की पहचान केवल आधुनिक अस्पतालों से नहीं, बल्कि डॉक्टर और मरीज के बीच कायम विश्वास से होती है। यही विश्वास चिकित्सा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।
-लेखक सीनियर सर्जन, आईएमए के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व एसएलजी हॉस्पिटल हनुमानगढ़ टाउन से संबद्ध हैं








