




ग्राम सेतु ब्यूरो.
अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जयंती। दोनों को लेकर समाज में उत्साह तो हर साल रहता है, लेकिन इस बार सवाल कुछ गहरे थे। क्या आयोजन केवल परंपरा निभाने तक सीमित रह जाए या नई पीढ़ी को भी जोड़ने का माध्यम बने? क्या समाज एकजुट होकर दिखेगा या फिर आयोजन बिखरा-बिखरा रहेगा? इन्हीं सवालों, चिंताओं और अपेक्षाओं के बीच 11 अप्रैल को दुर्गा मंदिर धर्मशाला में ब्राह्मण समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक का माहौल गंभीर भी था और उत्साह से भरा भी, मानो समाज अपने भविष्य की दिशा तय कर रहा हो।
सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि 19 अप्रैल को भगवान परशुराम जयंती हनुमानगढ़ के समस्त ब्राह्मण समाज द्वारा संयुक्त रूप से भव्य और दिव्य रूप में मनाई जाएगी। तय हुआ कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक गौरव और युवा सहभागिता का संदेश देगा।
कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार प्रातः 7.15 बजे भगवान परशुराम चौक पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ आयोजन का शुभारंभ होगा। इसके बाद सायं 3.15 बजे श्री राम मनोहर लोहिया स्कूल चौक से एक विशाल और भव्य रथयात्रा निकाली जाएगी। यह रथयात्रा शहर के प्रमुख मार्गों से होती हुई जंक्शन स्थित गौड़ ब्राह्मण धर्मशाला पहुंचेगी। आयोजकों के अनुसार रथयात्रा समाज की एकजुटता और शक्ति का प्रतीक होगी।
रथयात्रा के समापन के बाद सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसके साथ ही राजकीय सेवाओं में चयनित समाज की प्रतिभाओं का सम्मान किया जाएगा, ताकि युवाओं को प्रेरणा मिले और परिश्रम की संस्कृति मजबूत हो। कार्यक्रम के अंतिम चरण में सामूहिक ब्रह्मभोज का आयोजन कर आयोजन का विधिवत समापन किया जाएगा।
बैठक में समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। इनमें कालू राम शर्मा, डॉ. एम.पी. शर्मा, आशीष पारीक, प्रदीप एरी, भारत भूषण कौशिक, गिरिराज शर्मा, भवानी शंकर शर्मा, बीएल गौड़, महेन्द्र शर्मा, कुंजबिहारी महर्षि, सचिन कौशिक, सूर्य प्रकाश जोशी, लेखराम जोशी, डॉ. भारत भूषण शर्मा, संजय शर्मा, महेश शर्मा,हरिओम शर्मा, हिमांशु महर्षि, गोपाल शर्मा, नरेश पुरोहित, आनंद जोशी एवं वेदप्रकाश शर्मा प्रमुख रूप से शामिल रहे।
बैठक के अंत में समाज के पदाधिकारियों ने समस्त ब्राह्मण समाज से आह्वान किया कि अधिक से अधिक संख्या में भाग लेकर आयोजन को ऐतिहासिक बनाया जाए। वक्ताओं ने कहा कि यह आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज की एकता, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बने, यही इसका असली उद्देश्य है।






