





ग्राम सेतु ब्यूरो
सभागार में जैसे ही पहला स्वर उठा, हवा में रियाज़ की खुशबू घुल गई। ताल की थाप दिलों से टकराने लगी और शब्दों ने स्मृतियों के दरवाज़े खोल दिए। सुरों की ऐसी बरसात हुई कि समय ठहर-सा गया। कार्यक्रम समाप्त होने की घोषणा के बाद भी लोग जमे रहे, क्योंकि जब संगीत अपने शुद्ध रूप में उतरता है, तब श्रोता उठते नहीं, बस भीगते रहते हैं।
हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय स्थित हंसवाहिनी संगीत कला मंदिर के सभागार में आयोजित संगीत संगोष्ठी ने यह साबित कर दिया कि शास्त्र, भक्ति और फिल्मी संगीत जब साधना के साथ मंच पर आते हैं, तो उम्र और पीढ़ियों की सीमाएं टूट जाती हैं। करीब तीन घंटे चले इस कार्यक्रम में छोटे उस्तादों से लेकर अनुभवी फनकारों तक ने ऐसी प्रस्तुतियां दीं कि हर गीत के बाद तालियों की गूंज देर तक सुनाई देती रही।
कार्यक्रम की शुरुआत हिताक्षी, रूद्र, हर्षाली, पार्थ और क्रियांश द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुई। यह वंदना केवल एक औपचारिक आरंभ नहीं थी, बल्कि पूरे आयोजन की आत्मा बन गई। इसके बाद हिताक्षी, रूद्र और साहिल ने कबीर के दोहे गाकर श्रोताओं को जीवन-दर्शन से जोड़ा। सहज शब्द, सधी हुई गायकी और भावपूर्ण प्रस्तुति ने माहौल को गंभीर और चिंतनशील बना दिया।

संगोष्ठी ने इसके बाद रफ्तार पकड़ी। लवलीन, नायाब और साहिल ने ‘रुक जाना नहीं, तू कभी हार के’ गाकर सभागार को प्रेरणा से भर दिया। युवाओं की आवाज़ में आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। हुनरदीप, जय, दुर्गेश, लक्ष्य अरोड़ा और साहिल ने ‘उडारियां’ की प्रस्तुति से नई पीढ़ी के संगीत स्वाद को मंच पर उतारा। वहीं साहिल और लक्ष्य ने ‘उठे सबके कदम’ गाकर समूह गायन की सुंदर मिसाल पेश की।
अभिषेक द्वारा प्रस्तुत ‘भूत पिशाच निकट नहीं आवे’ में शास्त्रीय अनुशासन और भक्तिरस का सुंदर मेल देखने को मिला। इसके बाद मानवी, विधि, पावनी, क्रियांश, पार्थ, किआरा, पार्थ शर्मा और साहिल ने ‘सारे के सारे ग म को लेकर’ गाया तो श्रोता खुद को तालियां बजाने से रोक नहीं पाए। यह प्रस्तुति बाल कलाकारों की मेहनत और प्रशिक्षण का प्रमाण थी।
कार्यक्रम का एक यादगार पड़ाव तब आया जब जिज्ञासा और काव्या ने ‘ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा’ गाया। उनकी आवाज़ों ने श्रोताओं को श्वेत-श्याम सिनेमा के दौर में पहुंचा दिया। इसके बाद गुरफतेह, अभिषेक और नायाब ने ‘हम नहिं चंगे, बुरा न कोय’ गाकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
भक्ति की यह धारा और गहरी हुई जब पावनी, क्रियांश, पार्थ, किआरा, गुरफतेह और पार्थ ने ‘अच्युतं केशवम, कृष्ण दामोदरं’ प्रस्तुत किया। कई श्रोता आंखें बंद कर सुरों में डूबते नजर आए। निलिख, रूप और अमित की ‘जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं’ ने भावुक कर दिया, शब्दों का वजन और सुरों की सच्चाई सीधे दिल तक पहुंची। स्पर्श, पार्थ और गुरफतेह ने ‘हरी-हरी वसुंधरा’ गाकर प्रकृति और संस्कृति का सुंदर चित्र खींचा।
कार्यक्रम में एक रोचक मोड़ तब आया जब पत्रकारों की जोड़ी मनोज पुरोहित और राजेश कुमार ‘राहुल’ ने ‘सात अजूबे इस दुनिया में’ गाया। उनकी गायकी में ठहराव और संतुलन साफ दिखाई दिया, जिसने श्रोताओं को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया।
काव्या और हितैषी ने ‘तुम प्रेम हो, तुम प्रीत हो’ के माध्यम से राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम को स्वर दिया। वहीं रूप, अमित और निखिल ने शास्त्रीय राग अहीर भैरव प्रस्तुत कर संगीत की बारीकियों से श्रोताओं को परिचित कराया। कार्यक्रम के समापन की ओर बढ़ते हुए हितैषी, लक्ष्य अरोड़ा और अभिषेक ने ‘रंग-रंगीली धरती’ गाकर राजस्थानी संस्कृति को सजीव कर दिया।
कार्यक्रम में पत्रकार गोपाल झा और मनोज गोयल बतौर अतिथि मौजूद रहे। उन्होंने हंसवाहिनी संगीत कला मंदिर के संस्थापक गुलशन अरोड़ा के समर्पण और साधना की सराहना करते हुए अभिभावकों से बच्चों को संगीत की शिक्षा दिलाने का आह्वान किया। कला मंदिर की संरक्षक डॉ. सुमन चावला ने आभार व्यक्त किया। आयोजन को सफल बनाने में अध्यक्ष ममता अरोड़ा, जगदीश गुप्ता, विनोद यादव, श्रीप्रकाश शर्मा, विजय रस्सेवट, धर्मवीर अरोड़ा, मनमोहन शर्मा और रमेश पंचारिया का सहयोग रहा। कार्यक्रम का संचालन पवन बजाज ने किया।






