



एमएल शर्मा
‘जूते नहीं, स्लीपर पहनो। हाथ, नाक, कान, गले में कुछ भी पहना नहीं होना चाहिए।’ कुछ ऐसे ही शब्दों के साथ परीक्षा केंद्र में मूल आधार कार्ड स्वीकरण व सघन जांच के बाद अभ्यर्थियों को प्रवेश दिया गया। परीक्षा सम्पन्न हुई और नतीजा आने से पहले ही सरकारी फरमान आया कि पेपर लीक के चलते नीट परीक्षा रद्द!
लाखों विद्यार्थी एवं अभिवावक सकते में! परीक्षार्थियों का रो-रो कर बुरा हाल! पर उन सिसकियों की सरकार को परवाह ही नहीं! यह क्या बात हुई भला? परीक्षा केंद्रों में प्रवेश के लिए विश्वसनीयता के इतने चरण और पेपर की सुरक्षा राम भरोसे। विगत 3 मई को आयोजित नीट परीक्षा के दौरान नीट पेपर लीक कांड सरकार की विफलता का कथानक मात्र ही नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य से भद्दा मजाक है।
मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में पेपर लीक की घटना ने जिम्मेदारों की कलई खोल दी है। परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है। लाखों छात्र-छात्राएं अथक परिश्रम, आर्थिक निवेश और हाड़ तोड़ तैयारी के बाद इस परीक्षा में शामिल हुए ताकि डॉक्टर बनकर पीड़ित मानवता की सेवा का ख्याब हकीकत में बदल सके। परंतु जब परीक्षा से पहले ही पेपर लीक होने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल एक परीक्षा में गड़बड़ी नहीं, बल्कि भविष्य के भारतीय चिकित्सकों के साथ खुला अन्याय है। इस घटना से विद्यार्थियों का मानसिक मनोबल लगभग टूट ही गया है। बरसों की मेहनत लगता है जैसे पानी मे डूब गई। नाम तो ‘नीट’ है पर यह ‘क्लीन’ नहीं रही।
नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा का संचालन अत्यंत सुरक्षित, गोपनीय और निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए था, लेकिन बार-बार पेपर लीक, नकल माफियाओं की सक्रिय कारस्तानी और प्रशासन का ढुलमुल रवैया नाकामयाबी की कहानी खुद ही कह रहा है। यदि वास्तव में पेपर सुरक्षा के माकूल इंतजाम होते, परीक्षा प्रबंधन में खामी ना होती, कुशल निगरानी होती और उत्तरदायी अधिकारियों की जवाबदेही तय होती, तो लाखों छात्रों के जीवन से खिलवाड़ नहीं होता। पेपर लीक का सबसे बड़ा खामियाजा उन मेहनतकश विद्यार्थियों पर पड़ा है जिनके माता पिता मजदूरी करते हुए ‘फाकाकशी’ भुगत कर बच्चों को योग्य बनाना चाह रहे थे। किन्तु जब, भ्रष्ट तंत्र के कारण नकल माफिया के पेपर बेचने के फेर में अनुचित साधनों से कुछ लोग लाभ उठाते हैं, तो परिश्रमी छात्रों का मनोबल टूटता है। खैर, मौजूदा दौर में शिक्षा प्रणाली बाजारवाद के शिकंजे में जकड़ी जा चुकी है।
बहरहाल, पेपर लीक कांड सामने आने के बाद हुक्मरानों का वही रटा रटाया जुमला उछला कि मामले के प्रति सरकार गंभीर है, जांच होगी, दोषियों को दंड मिलेगा, आदि-आदि। यह पहली दफा नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बाकायदा ट्वीट कर लिखा कि युवा वर्ष 2024 में एनटीए निदेशक का नाम व वर्तमान पद गूगल करे, सरकार की मंशा पूरी तरह साफ हो जाएगी। बड़ा सवाल है कि आखिर ऐसे हालातों से देश का भविष्य कब तक रूबरू होता रहेगा? वर्तमान में महज परीक्षा प्रणाली की कमजोरी ही नहीं दिखाई दे रही अपितु, यूथ के सपनों की सुरक्षा को लेकर सियादतदानो की गंभीरता का असली मुखोटा दर्शा रही है। जिम्मेदार सरकार मात्र जांच बैठाने को ही अपना दायित्व ना समझे वरन अब दरकार है कि इस घटना में साझेदार रहे ‘नकल नेटवर्क’ के विरुद्ध प्रभावी विधिक कार्रवाई करें, अभेद्य सुरक्षा तंत्र हो, परीक्षा संचालन पारदर्शी हो। साथ ही परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार, डिजिटल सुरक्षा, प्रश्नपत्र वितरण तंत्र मजबूत बनाया जाए। ताकि ऐसी घटनाएं फिर ना हो। देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी स्थिति में जायज नहीं हो सकता। आज नकल माफिया के बढ़ते दखल के चलते हिंदुस्तान की प्रतिभा व प्रगति खतरे के निशान पर है। आज दरकार है कि हुक्मरान सियासी बयानबाजी को परे रखकर ठोस और कठोर कदम उठाए। असल में परीक्षा प्रणाली को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना ही सरकार की परीक्षा होती है। नहीं तो पेपर लीक जैसी घटनाएं युवाओं का आने वाला कल कुचलती रहेगी जो बहुत ही भयावह तथा दुर्भाग्यपूर्ण होगा।







