



रजनी शर्मा
पिता..
हमेशा साथ रहते है,
हर कठिन समय में,
सिर पर स्नेहिल हाथ रखकर,
हौसलों के दीप जलाते हैं।
पिता..
अब नहीं है दुनिया में,
फिर भी न जाने क्यों,
मन बार-बार तरस जाता है,
उनका चेहरा देखने को,
उनकी आवाज सुनने को।
पिता..
वो छांव थे,
जो तपती धूप में,
सुकून बन जाया करती थी।
वो आवाज थे,
जो हर डर,हर संशय में,
हिम्मत बनकर साथ खड़ी रहती थी।
पिता..
आज भी जीवन के हर मोड़ पर,
उनकी सीख मेरा पथ आलोकित करती है।
मेरी हर छोटी बड़ी जीत में,
उनकी खामोश दुआ शामिल रहती है।
पिता..
मैं आपका ही अंश हूं,
आपकी ही परछाई हूं,
फिर भी यह दिल कहता है,
एक बार फिर लौट आओ,
उसी अपनत्व से,उसी स्नेह से,
माथे पर हाथ फेर जाओ।
पिता..
आपका आशीर्वाद ही,
हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।
जब भी आंखें नम होती है,
आपके साथ बीते बालपन की यादें…
मन को सहला जाती है।
पिता..
कभी जाते नहीं,
वो अपनी संतानों के संस्कारों,
स्मृतियां और प्रार्थनाओं में सदैव जीवित रहते हैं।






