




रूंख भायला
राजी राखै रामजी !काल आजादी आयोड़ी ही, हथाई चौक पर। मैं पूछ्यो-
‘कियां है आजादी ?’
बा रिसाणी सी होयोड़ी बोली, ‘म्हूं तो आखती होगी, अबै पाछी जिस्यूं !
‘हैं…पाछी जिसी ! आ के बात होयी ?’
‘और के, थारा डोळ इस्या ई है, जाणो ई पड़सी।’
‘क्यूं ! म्हारा डोळ के माड़ा है ? आपरा डोळ देख्या कोनी के, कित्तै जणा रो भख लेय’र बैठी है !’ चौक पर तास पीटती मंडळी सूं अेक सुर उठ्यो। अे बेटा तास रा चास्कू है तो कारीगर, आंख्यां बाजी पर, अर कान चौफेर। ध्यान तो सो है आन्नै, पण सीप ले बैठै, कांई ठाह कद लाग जावै !
‘भख स्यार जाणो ई हो के ?’ तास मंडळी सामीं आंख्या काडती आजादी गुर्राई।
‘म्है सो कीं जाणां, बोली रैयजा, नीं फेर कुटीजैली….। पत्तां पर निजरां गडायां अेक दूजो सुर बोल्यो।
‘अरे डोफो ! म्हूं तो उणी दिन कुटीजगी ही जद अस्सी बरसां पैली थारलै देस आई ही, कुटीज तो अबै थे रैया हो, आज नीं तो काल, थारै तो सीप लागणी ई है।’
‘बान्नै छोड आजादी, बम पड़ै चायै गोळा, अे बाज्यां तो बियां ई चालसी। थूं तो आ बता, रिसाणी कियां हो रैयी है ? आज तो थारै नांव रो उच्छब है आखै देस में…अर थूं ऊंधी बात करै।’
‘क्यूं दिखावो करो, अेक दिन खातर थे इत्ता लच्छ करो कै भांड ई सरमा मर जावै। इयां लागै आखी जगती में थां सूं मोटा देसभगत जलम्या ई कोनी। लाडी, इस्कूलां में लाडू बांट्यां, तिरंगो लै’रायां का डीजे पर ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ बजायां देसभगती को दीसै, थारा पोत ई उघड़ै है आं लखणां…। आज जेकर गांधी भगतसिंघ, सुभाष बाबू जिस्या लोग, जिकां म्हानै ल्यावण सारू आपरो भख दियो, पाछा आय’र देखै तो बै ई सरमा मर जावै कै आं गैलसप्पां खातर म्है बलिदान दियो…।’
लाग्यो, आज तो आजादी काठी भरीजेड़ी है, अस्सी बरसां री डोकरी रोवण नीं ढुक जावै। म्हूं कीं लपोसा लगावण री तेवड़ी।
‘थारी रीस जायज है आजादी, म्है भोत लिपळा लोग हां, थारी रूखाळ करणै सूं बेसी आपरी रोट्यां हेठै खीरा देवता फिरां।’
‘अरे चितबगनो, मेरी छोडो, थारली रोट्यां हेठै तो खीरा सावळ देल्यो। ओ देस थारो है, देस नै देस मानों तो सरी, घर सूं बारै निसरतां ई थान्नै देस चेतै ई नीं रैवै। म्है अर म्हारो घर…बस ! बेटी रा बापो, जिकी गळी में, जिकै मोहल्लै में थे रसो बसो, बो ई तो देस है। उण री सुध लेवो, जिकी नदियां रो पाणी पीवो, बै ई तो देस है, जिकै रूंखां री छियां बैठो, जिकी सड़कां माथै चालो बै ई तो देस है, जिकै खेतां में धान निपजै, जिकी भौम सूं खजानो काडो बो ई तो देस है, उण री तो संभाळ करो…।’
‘संभाळ तो करां ई हां, जणाई इत्तो बिगसाव होयो है।’
‘अरे भोळा स्याणो, जिका देस थारै साथै जलमिया हा, बै आज कित्ता आगै है थां सूं…देखो परखो अर फेर बात करो। इण देस रो धन आज गिण्यै चुण्यै हाथां में है, बाकी लोगड़ा अजेस ई भूख सूं बांथेड़ा कर रैया है, रोटी टुकड़ै रा ई पूरा ठिकाणा कोनी…आ ई बरोबरी करी है के ? अेक भोत सांतरो संविधान बणाय’र थान्नै सूंप्यो हो, पण थे तो पारट्यां रै झंडां में इस्या अळूंझ्या कै देस नै छोड’र बांरी गुलामी करण लागग्या। देस री ठौड़ मिनख पूजण लागग्या, पगचंपी में थे सगळा रिकार्ड तोड़ दिया, आपरा घर भरण लागग्या, आपरा सिट्टा सेकता रैया, देस जावै भाड़ में…।
बातां तो साव खरी-खरी ही आजादी री, सुणता रैया, बोलण नै हो ई के म्हां कन्नै।
‘जिकै धौळपोसियां नै थे देस री बागडोर सूंपी, बै ई थारै तेलो दे रैया है। वोटां री राजनीति में गिंधसूरड़ी दांई इस्या पज्या हो कै चौफेर गिंधावतो कादो कर न्हाख्यो है…। चोरी, जारी, बेईमानी रा लक्खण तो थारी रगां में इस्या पोइज्या है, कै आगली पीढी में मतैई आ जिसी। झालरो, दारू रा ठेका बांट’र थे नसामुगति कैंप लगावण रा सांग क्यूं करो ?’
‘सोचो दिखाण, संविधान जिकां नै लोकसेवक बणाया बां रै सामीं तो देस रो लोक हाथ जोड़्यां खड़्यो रैवै, लीलड़ी गाबो करै…पण बै तो मनोमन खुद नै ई राजा माने बैठ्या है…जे ओ ई लोकराज है तो धूड़ है। कोई ढकणी लाधै तो नाक डबोल्यो….पण नाक तो थारै है ई कोनी !’
‘कीं कैय ले आजादी, म्है तो हां जिस्या ई हां, नाक ई होवतो तो इत्ती बात सुणता थोड़ी !’
‘म्हूं तो सरू में ई कैयो हो थान्नै, बात नाकोनाक आयोड़ी है, थारा डोळ ई कोनी कै थे आजादी री रूखाळ कर सको !’ आजादी इयां उठ खड़ी होई जाणै कोई जमीर आळो आदमी
भरी पंचायत पर धूड़ रेड़’र उठ’र जावै। लाग्यो, बा अबै घड़ीस्यात ई नीं ठमै।
‘इयां के करै अे आजादी…, रूस्या करै ! आ सोच, म्है हां भोळाढाळा लोगड़ा, बात रो तत नीं जाणां, पछै थारो सत कियां पिछाणां ! कीं तो सोच, जेकर अबकै म्है पाछा गुलाम बणग्या तो जुगां तंई खेड़ो नीं छूटैला। सोच दिखाण, कुणसो भगतसिंघ भख देवैला, कुण गांधी दांई ललकारैला ? मानी कै म्है अधगैला अर डोळबायरा हां पण म्हारा टाबरिया…? बां रै सामीं तो देख, कित्तै हरख सूं तिरंगो लियां थारा गीत गा रैया है….।
‘अपनी आजादी को हम हरगिज भुला सकते नहीं…’। हथाई चौक रै सारै सूं टाबरां री अेक टोळ जावै ही जिकां रै हाथां में छोटा-छोटा तिरंगा हा। आं टाबरां रा चौरा मुळकै हा, मन में अेक निरवाळो जोस दीसै हो, पण बै लाई कांई जाणै कै आजादी तो आज रूस्यां बैठी है।
लाग्यो, अे टाबर ई आजादी नै ढाब सकै, आं रै मिस ई सही, आजादी नै कियां ई ठामां। म्हूं टाबरां रो ओळाव लेय’र भळै अरज करी।
ईं लीलड़ी रो असर ओ होयो, का टाबरां रै पळकतै मूंडां रो, आजादी अेकर ठमगी, नेड़ै आय’र बोली-
‘अस्सी आग्या थारै चातरपणै रा रंग देखतां…पण किस्यै दरड़ै में पड़ूं….जद-जद आं टाबरां नै देखूं, अेक आस जागै, कठैई आगली पीढी में कोई स्याणा नीकळै ई तो..!’ आजादी तो गळगळी होगी।
म्हूं कांई बोलतो, बोलण में सार ई के…आजादी री बातां तो साव साची…म्है मडां रा पूत तो कपूत ई नीसरया हां। तोई निसरमो होय’र म्हूं खिड़-खिड़ दांत दिखाया अर आजादी सामीं हाथ जोड़ दिया, उण रा पग काठा झाल लिया, भूण नीची घाल्यां डाड्यो-
‘को जावण द्यूं नीं, को जावण द्यूं नीं, को जावण द्यूं नीं !’
‘फेर लच्छ करै सरमबायरा ! थारी तो ऊत गयोड़ी ई है। पण अबै म्हूं ठमस्यूं, थारै तंई नीं, आं टाबरां तंई जिकां में हूंस है, उमंग है, अेक निरमळ मन है, लागै है अे ई म्हारी रूखाळ करैला…!’
‘बस, बस…आजादी ! अबै और सरमां ना मार…म्है आज सूं ई चेतो राखस्यां थारी रूखाळ रो…, डोळ सारू खेचळ ई खास्यां, थूं अेक मौको और दियो है, लखदाद है थान्नै…!’
आज री हथाई रो सार ओ है, आजादी री रूखाळ करो लाडी, नीं पछै, आपणा कंठ मोसण नै गुलामी रा भळै फंद त्यार है। अबकै पज्यां छूटांला ई कोनी। आदतां बदळो, झंडां अर डंडा सूं उपर उठो, आपणै लोकराज नै सांवठो करो। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं







