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जब किसी की याद आते ही चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान और दिल में गहरा सम्मान तैर जाए, तो समझ लीजिए कि उस इंसान ने जिंदगी को सिर्फ जिया नहीं, बल्कि सार्थक किया है। वेदप्रकाश झूंथरा ऐसे ही विरले व्यक्तित्व थे। अगर आप एक आकर्षक चेहरा, हमेशा खिली रहने वाली हंसी, स्वभाव में सहज विनम्रता, चुटीला विनोद और किसी का भी दुख देखकर पसीज जाने वाला सेवाभावी दिल, इन सबको एक जगह मिला दें, तो जो साक्षात् रूप सामने आएगा, वही थे वेदप्रकाश झूंथरा।
1 सितंबर 2016 की तारीख झूंथरा परिवार और उनके अनगिनत चाहने वालों के लिए एक गहरा शून्य छोड़ गई। अपने परिजनों के बीच, सबको अपना स्नेह भरा हाथ उठाकर आशीष देते हुए वे शांत भाव से परमात्मा की गोद में समा गए। उनके जाने के बाद हनुमानगढ़ जंक्शन की श्यामसिंह कॉलोनी स्थित उनके घर ‘कुबेर हाउस’ में जो लोग श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं, उनकी जुबान पर बस एक ही बात है, ‘वेदप्रकाश जी सिर्फ एक इंसान नहीं, कई जिंदगियों का सहारा थे।’ वे किसी की भी तकलीफ को अपनी तकलीफ समझ लेते थे और जब तक उसका हल न निकाल लें, चैन से नहीं बैठते थे।
वेदप्रकाश झूंथरा के भीतर जो स्वाभिमान और जुझारूपन था, उसकी जड़ें उनके पारिवारिक इतिहास में थीं। देश के बंटवारे का गहरा दंश झेलकर उनके पितामह पाकिस्तान के झूंथरा गांव से सब कुछ छोड़कर पंजाब के अबोहर आ बसे थे। अपने गांव में वे कभी ‘नगर सेठ’ हुआ करते थे। वक्त बदला, जमीन बदली, लेकिन संस्कार वही रहे। अबोहर की आबोहवा में पले-बढ़े वेदप्रकाश झूंथरा ने जीवन की चुनौतियों को बहुत करीब से देखा और समझा।
नवंबर 1970 का वक्त था, जब उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (एसबीबीजे) में अपनी सेवाएं शुरू कीं। डूंगरगढ़, श्रीगंगानगर, पीलीबंगा, गोलूवाला और हनुमानगढ़ जैसी विभिन्न जगहों पर उनकी पदस्थापना रही। कुल 32 वर्षों के अपने सेवाकाल में उन्होंने कभी भी काम को सिर्फ नौकरी नहीं समझा, बल्कि लोगों से जुड़ने का जरिया बनाया। वे जहां भी रहे, ग्राहकों और सहयोगियों के चहेते रहे।
सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी जिंदगी ने एक बेहद क्रूर मोड़ लिया। एक दर्दनाक सड़क हादसे में उन्होंने अपने भरे-पूरे संसार से अपने नौजवान बेटे को खो दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दर्द दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता। वे अंदर से बुरी तरह टूट गए।
इस गहरे सदमे के बाद उन्होंने साल 2001 में बैंक के शाखा प्रबंधक (ब्रांच मैनेजर) पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। नौकरी छोड़ दी, लेकिन असली जिम्मेदारी तो अब शुरू हुई थी, पूरे परिवार को ढाढ़स बंधाना, टूटे हुए मन को जोड़ना और बिखरती हिम्मत को समेटना। उन्होंने इस पहाड़ जैसी परिस्थिति का सामना जिस संयम और धैर्य से किया, वह हर किसी के बस की बात नहीं होती।
जब वक्त के साथ घर का माहौल थोड़ा संभला, तो वेदप्रकाश झूंथरा के भीतर का सेवाभावी मन फिर से अंगड़ाई लेने लगा। वैसे तो वे पहले से ही लायंस क्लब और लियो क्लब जैसी संस्थाओं के जरिए समाज सेवा में सक्रिय थे, मगर अब वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जो सीधे किसी मजबूर की जिंदगी बदल दे।
एक दिन उन्होंने अपने बेटे रमण झूंथरा को पास बुलाया और बहुत सहजता से कहा, ‘बेटा, हमें कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण का काम शुरू करना है। जो लोग बेबस और निःशक्त हैं, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना है।’ रमण झूंथरा उस समय अपने कारोबार में व्यस्त थे, पहले तो चौंके, लेकिन पिता के संकल्प और उनकी आंखों की चमक देखकर उन्होंने इसे अपना जीवन-ध्येय मान लिया।
मारवाड़ी युवा मंच का मार्गदर्शन मिला, ‘राहुल गुप्ता मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट’ के जरिए उन्होंने इस काम की शुरुआत की। पिता की प्रेरणा का ही असर था कि आज यह संस्थान करीब 60 हजार से अधिक निःशक्तजनों को नए अंग देकर उनके जीवन में नई उम्मीद जगा चुका है। हनुमानगढ़ की दीप सिंह कॉलोनी स्थित केंद्र में आज भी जब कोई व्यक्ति अपने नकली पैरों पर पहली बार चलता है, तो उसकी हर एक डग में वेदप्रकाश झूंथरा की सोच और उनका आशीर्वाद झलकता है।
हनुमानगढ़ से झूंथरा परिवार का अलग ही रिश्ता है। खुद वेदप्रकाश झूंथरा का ननिहाल हनुमानगढ़ टाउन है। उनका ससुराल भी टाउन में है, प्रतिष्ठित मुण्डेवाला परिवार। पुत्रवधू रीमा गुप्ता का ननिहाल भी टाउन ही है। खैर। वेदप्रकाश झूंथरा ने जीवन में जो सादगी और अनुशासन अपनाया, उसी का नतीजा है कि उनका परिवार आज संस्कारों और सफलता की मिसाल है।
धर्मपत्नी शारदा देवी ममता और सहजता की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं, जिनका अपनत्व हर मिलने वाले का दिल छू लेता है। पुत्र रमण झूंथरा ने अपने पिता की सेवाभावी विरासत को पूरी विनम्रता के साथ आगे बढ़ाया है। पुत्रवधू रीमा उच्च शिक्षित, सुसंस्कृत और पूरे घर को एक धागे में पिरोकर रखने वाली महिला हैं। परिवार की नई पीढ़ी में दोनों पोते डॉ. राघव और इंजीनियर शुभम अपने-अपने क्षेत्रों में नाम रोशन कर रहे हैं। पुत्री रचना का विवाह श्रीगंगानगर के प्रतिष्ठित परिवार के सफल व्यवसायी मनोज गुप्ता के साथ हुआ। दोहिती रूपम के पति देवेंद्र गुप्ता प्रधानमंत्री के सोलर प्रोजेक्ट की एडवाइजरी कमेटी के सम्मानित सदस्य हैं, वहीं दूसरी दोहिती रचिता के पति प्रेसन माथुर ग्रो कंपनी में सॉफ्टवेयर यूनिट हेड हैं।
कुल मिलाकर, हर कोई जाने के लिए ही यहां आया है। लेकिन जिक्र उसी का होता है जो लीक से हटकर पहल करते हैं। वेदप्रकाश झूंथरा का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे नेक हों, तो इंसान अपने सबसे बड़े व्यक्तिगत दुख को भी दूसरों के आंसुओं को पोंछने का जरिया बना सकता है। उनका भौतिक शरीर भले ही हमारे बीच न हो, लेकिन उनकी मुस्कान, उनकी जिंदादिली और समाज को दी गई नई रोशनी हमेशा-हमेशा के लिए अमर रहेगी।






