






रजनी शर्मा
बनो तो देहरी का दीप बनना,
जो केवल घर की चौखट ही नहीं,
आने-जाने वाले हर मुसाफिर के
मन का अंधियारा भी हरना।
किसी की बुझती उम्मीद में
थोड़ी-सी लौ बनकर जलना,
किसी की उदास आँखों में
आने वाले कल का सपना भरना।
बनो तो देहरी का दीप बनना…
रोजगार की तलाश में
परदेस की भीड़ में खो गए रिश्तों को,
शहर की चकाचौंध में
धुंधली पड़ गई गाँव की पगडंडियों को
फिर से आँखों में उतारना।
माँ की पुकार,
बाबुल के आँगन की गंध,
तुलसी के चौरे की साँझ
और…
घर की चौखट पर ठहरी आत्मीयता को
उनके भीतर फिर से जगाना।
भटके हुए पाँवों को
घर लौटने का रास्ता दिखाना,
अपनों के लिए तरसते मन को
अपनों की दहलीज तक पहुँचाना।
बनो तो देहरी का दीप बनना…
न हवाओं से कोई शिकायत,
न अँधेरों से कोई बैर,
बस अपने हिस्से का उजास लेकर
निरंतर जलते रहना।
किसी के जीवन की अमावस में
पूर्णिमा का अहसास बनना,
टूटी हुई आस के माथे पर
विश्वास का चंदन धरना।
बनो तो देहरी का दीप बनना,
जो स्वयं जलकर भी
दूसरों के लौटने की राह रोशन करता है,
जो अँधेरे से लड़ने का शोर नहीं करता,
बस चुपचाप उजाला बाँटता है।
बनो तो देहरी का दीप बनना…






