







तमन्ना गवाँ
चंद सिक्कों में मैंने माँ को घर चलाते देखा है,
रहकर खुद भूखी, उसे दूसरों को खिलाते देखा है।
कभी-कभी लगता है, माँ जादूगर है क्या?
मैं दूर रहकर भी तड़पूँ, तो वह दर्द पहचान लेती है,
बिना छुए ही हर ज़ख्म का इलाज जान लेती है।
शुक्रिया कैसे करूँ तेरा, माँ?
जब-जब कोशिश करती हूँ,
दिल भर आता है मेरा।
मैं गहरा घाव सही, तू सुकून का मरहम है,
मैं बिखरी कलम कोई, तू मुकम्मल डायरी है।
तपती धूप सी हूँ मैं, तू शीतल छाँव है,
डूबने का डर किसे, जब तू ही मेरी नाव है।
मैं एक छोटा सा किस्सा, तू पूरी दास्ताँ है,
मंज़िल कोई भी चुनूँ, तू ही तो रास्ता है।
यहाँ समझाने पर भी लोग समझते नहीं,
तू बिन बोले ही खामोशी पढ़ लेती है;
हैरान हूँ यह सोचकर, माँ
तू इतने जादू कैसे कर लेती है?
मेरा हर हरा ज़ख्म भी जैसे भर गया,
जब-जब प्यार से तूने मुझे छुआ है।
दुःख कभी तुझे ढूँढ न पाए,
खुशियाँ तेरा आँगन छोड़ न जाएँ,
उस रब से मेरी बस यही दुआ है।
एक बात मुझे अक्सर हैरान करती है,
कि तू घर में कैसे अकेली रह जाती है?
नहीं दिखती आसपास कोई सहेली तेरी,
फिर कैसे अपनी तन्हाई सह जाती है?
तुझे घर में तन्हा छोड़, हम सब
निकल पड़ते हैं रोज़गार के सिलसिले में;
तू दिन भर काम करती है,
कैसे जीती है अकेले उस आशियाने में?
तू खुद को भुला देती है हमेशा,
तुझे हर पल बस हमारा ख्याल रहता है;
माँ, तू इतना बेपनाह प्यार कैसे कर लेती है?
ज़हन में मेरे बस यही सवाल रहता है।
शायद इसीलिए हर तकलीफ हमसे जुदा है,
क्योंकि माँ, तू हमारे घर की सबसे बड़ी योद्धा है।
हम थककर लौटें जहाँ, तू वह महफ़ूज़ किनारा है,
सुबह आँख खुले तो जिसे देखें, तू वह हसीं सवेरा है।
हो कोई पीड़ा तो तू ही सहारा देती है,
हारने लगें कभी, तो हौसला और भरोसा देती है।
तू इतनी खूबसूरत है कि तुझसे हसीं कोई जन्नत न हो,
दें अगर हम तुझे कोई दर्द, तो खुदा करे हमारी ज़मानत न हो।
माँ, कुदरत की तराशी सबसे हसीन रचना है,
यह सिर्फ शब्द नहीं, मेरी रूह की आवाज़ है,
खुदा ने जो कुछ भी बनाया इस जहाँ में,
सब माँ के बाद है, सब माँ के बाद है।






