




गोपाल झा
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सत्ता अपने खिलाफ उठी आवाज़ को सुनने का धैर्य रखती है। जब सत्ता सुनना बंद कर देती है, तब सड़कें बोलने लगती हैं। और जब सड़कों की आवाज़ भी अनसुनी कर दी जाती है, तब इतिहास बोलता है। जंतर-मंतर बार-बार इसी इतिहास का साक्षी बना है।
इस बार भी जंतर-मंतर पर कोई क्रांति नहीं हो रही थी। वहां कोई सत्ता पलटने की साजिश नहीं थी। वहां वे युवा थे जिनके सपनों पर नीट प्रश्नपत्र लीक ने प्रश्नचिह्न लगा दिया था। वे अभिभावक थे जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई में लगा दी। वे नागरिक थे जिन्हें लगने लगा कि मेहनत से ज्यादा असर अब जुगाड़ और व्यवस्था की खामियों का है। उनके बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी थे, जिन्होंने अनशन का रास्ता चुना। लोकतंत्र में अनशन आखिरी हथियार होता है। जब संवाद के सारे दरवाजे बंद हो जाएं, तब आदमी अपने शरीर को ही अपनी याचिका बना देता है।
बीस दिन तक जंतर-मंतर पर लोग आते रहे। भीड़ बढ़ती रही। सवाल बढ़ते रहे। लेकिन जवाब नहीं आए। लोकतंत्र में सरकार का सबसे पहला कर्तव्य यह नहीं कि वह हर मांग मान ले, बल्कि यह है कि वह हर पीड़ा को सुने। संवाद कभी सरकार को छोटा नहीं बनाता। उलटे, वह उसके कद को बड़ा करता है। लेकिन जब संवाद की जगह मौन ले लेता है, तब अविश्वास जन्म लेता है।
फिर आंदोलन संसद की ओर बढ़ा। पुलिस भी आई। बैरिकेड भी लगे। धक्कामुक्की हुई। लाठी चली या आवश्यक बल प्रयोग हुआ, इस पर मतभेद हो सकते हैं। वीडियो अलग-अलग कहानी कहते हैं, बयान अलग-अलग सच गढ़ते हैं। लेकिन एक तस्वीर ऐसी थी जिस पर शायद कोई विवाद नहीं होना चाहिए था, देश का युवा अपनी बात कहने के लिए सड़क पर था और सत्ता उससे बातचीत की मेज तैयार नहीं कर पाई, उस तक पहुंचना और बात है। लोकतंत्र की हार अक्सर यहीं से शुरू होती है।
उधर, संसद में भी वही दृश्य था। सत्ता और विपक्ष आमने-सामने थे। नारे थे, पोस्टर थे, स्थगन था, आरोप थे। लेकिन देश पूछ रहा था कि बहस कहां है? संसद यदि जनता के सवालों पर बात नहीं करेगी तो फिर उसका सबसे बड़ा औचित्य क्या रह जाएगा? लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं है। लोकतंत्र उत्तरदायित्व का भी नाम है।
नीट का प्रश्नपत्र लीक केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह उस भरोसे की दरार है, जिस पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है। जिस समाज में शिक्षा ही सबसे बड़ा सहारा मानी जाती हो, वहां परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना किसी भी सरकार के लिए गंभीर चेतावनी होना चाहिए। ऐसे मामलों में जवाबदेही मांगना राजनीति नहीं, लोकतांत्रिक संस्कार है। जांच हो, दोषी पकड़े जाएं और यदि प्रशासनिक स्तर पर चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय हो। यही परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
आज समस्या केवल यह नहीं कि जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ। समस्या यह भी नहीं कि संसद में हंगामा हुआ। असली समस्या यह है कि हमारे लोकतंत्र में संवाद सिकुड़ता जा रहा है। हर असहमति को विरोधी खेमे का एजेंडा मान लेने और हर सरकारी निर्णय को साजिश कह देने की प्रवृत्ति ने बीच का रास्ता लगभग खत्म कर दिया है। जबकि लोकतंत्र उसी बीच के रास्ते का नाम है।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था, ‘जब सड़कें सूनी हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है।’ यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। लेकिन इसका दूसरा अर्थ भी है, जब संसद जनता की आवाज़ सुनना छोड़ देती है, तब सड़कें भरने लगती हैं। जंतर-मंतर उसी भरी हुई सड़क का नाम है।
सवाल किसी एक सरकार का नहीं, लोकतांत्रिक चरित्र का है। सत्ता बदलेगी, विपक्ष भी बदलेगा, लेकिन देश तभी बचेगा जब जनता का भरोसा बचेगा। युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, वह निष्पक्ष व्यवस्था मांग रहा है। वह केवल परीक्षा नहीं, अपने भविष्य की सुरक्षा मांग रहा है। उसकी मांग को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के आईने में देखने की जरूरत है।
लोकतंत्र की सेहत संसद की ऊंची दीवारों से नहीं, जंतर-मंतर की खुली जमीन से भी मापी जाती है। क्योंकि वहीं पता चलता है कि जनता अब भी बोल रही है। अब देखना यह है कि सत्ता सुनती है या केवल शोर सुनाई देता है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







