









सुनीता गोदारा
बचपन की यादों के पन्ने पलटूं तो हर सुबह का एक ही दृश्य मन में सजीव हो उठता है। घर में एक मीठी सी हलचल होती थी, एक तरफ मैं स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर बस्ता संभालती, तो दूसरी तरफ पापा करीने से तैयार होकर अपने दफ्तर के लिए निकलते। चाहे 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, उस रोज घर से सिर्फ हम दोनों ही अपनी-अपनी ‘ड्यूटी’ के लिए साथ कदम बढ़ाते थे। पापा को अपने राष्ट्र और विभाग के प्रति निष्ठा का दायित्व निभाना होता था, और मुझे स्कूल के राष्ट्रगान व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी हाजिरी देनी होती थी। तब यह रोज का नियम बहुत सामान्य, कभी-कभार थोड़ा नीरस भी लगता था। पर किसे पता था कि समय का पहिया इतनी तेजी से घूमेगा और वही साधारण लगने वाले पल जीवन की सबसे अनमोल थाती बन जाएँगे।
वर्ष 1992 में शुरू हुआ पापा का यह सफर केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि अटूट निष्ठा, ईमानदारी और निस्वार्थ कर्म का एक जीवंत दस्तावेज रहा है। बालोतरा की नगर पालिका से शुरू होकर हनुमानगढ़, पीलीबंगा, सूरतगढ़, श्रीगंगानगर और फिर जोधपुर नगर निगम तक का यह सफर केवल शहरों का बदलना नहीं था; यह पापा के अनुभव, प्रतिष्ठा और जनसेवा के विस्तार की यात्रा थी। राजस्थान के अलग-अलग कोनों में सेवा देते हुए उन्होंने हर जगह अपनी कार्यशैली और सादगी से लोगों के दिलों में एक सम्मानजनक मुकाम बनाया।
सरकारी सेवा की व्यस्तताओं और तबादलों के बीच पापा ने कभी परिवार की नींव को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा जिस भक्तिभाव से की, वह हमारे लिए संस्कारों की सबसे बड़ी पाठशाला बन गई। अपने भाई-बहनों के लिए वे हमेशा एक मजबूत, अडिग स्तंभ की तरह खड़े रहे। परिवार में जब भी किसी पर कोई संकट आया, पापा बिना किसी संकोच के सबसे पहले ढाल बनकर आगे आए। केवल अपने चौखट तक ही उनका दायरा सीमित नहीं रहा; समाज के जरूरतमंदों के लिए उनके हाथ सदा खुले रहे। दान-पुण्य हो या किसी बेसहारे का संबल बनना, पापा ने हमें सिखाया कि सफलता सिर्फ अपने लिए जोड़ने का नाम नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य से दूसरों के जीवन को संवारने का नाम है।
वक्त अपनी रफ्तार से बहता रहा। मेरी पढ़ाई पूरी हुई, शादी हुई, बच्चे हुए और मैं अपनी गृहस्थी व नई जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गई। इस भागदौड़ में पापा की सेवानिवृत्ति का दिन कब आ गया, पता ही नहीं चला। आज जब लगभग तीन दशकों से अधिक के इस बेदाग और गौरवपूर्ण सेवाकाल का समापन हुआ है, तो मन में गर्व और भावुकता का एक अनोखा संगम है।
आज जब मैं सोचती हूँ, तो आँखें भीग जाती हैं। अब सुबह पापा उठेंगे तो उन्हें दफ्तर की कोई फाइल समेटने की जल्दी नहीं होगी, न ही घड़ी की सुइयां उनके कदमों की रफ्तार तय करेंगी। जिस इंसान को मैंने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ दूसरों की जिम्मेदारियों के लिए सुबह निकलते और शाम ढले लौटते देखा, आज उन्हें उस दायित्व की दौड़ से विश्राम लेते देखना एक सुखद अहसास देता है।
पापा, यह आपके सफर की नई और उस जीवन की शुरुआत है जिसे आपने हमेशा दूसरों के लिए स्थगित कर दिया था। नगर पालिका से नगर निगम तक की आपकी यह गौरवमयी यात्रा हमारे सिर का ताज है। आपने जो मुकाम हासिल किया, हम बच्चे बस यही दुआ करते हैं कि हम आपके दिखाए उसूलों पर चलकर आपके नाम को उतनी ही ऊँचाइयाँ दे सकें। अब आपकी बारी है, फुर्सत की धूप सेकने की, अपनी अधूरी ख्वाहिशों को जीने की और अपनों के साथ सुकून के पल बिताने की। आपकी बेटी होने पर मुझे कल भी गर्व था, आज भी है और ताउम्र रहेगा। सेवाकाल की इस शानदार पारी के लिए नमन, और जीवन के इस नए, सुनहरे अध्याय के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।






