




गोपाल झा
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं होती, चुनाव नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी ताकत वह नागरिक होता है, जो यह तय कर ले कि अब अन्याय के सामने चुप नहीं रहेगा। भारत की राजनीति में समय-समय पर ऐसे क्षण आए हैं, जब सत्ता को यह भ्रम हो गया कि वही देश है, वही लोकतंत्र है और वही अंतिम सत्य है। लेकिन इतिहास बार-बार बताता है कि जनता देर से जागती है, पर जब जागती है तो सत्ता के सबसे ऊँचे सिंहासन की नींव भी हिल जाती है।
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिसे लोग ‘जेन जी’ कहकर हल्के में ले रहे थे, वही पीढ़ी लोकतंत्र की सबसे मुखर आवाज बनकर सामने खड़ी हो गई। जिन युवाओं पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हैं, उन्होंने सड़कों पर उतरकर बता दिया कि लोकतंत्र की असली स्क्रीन जनता का विवेक होता है।
आंदोलन की शुरुआत शिक्षा के सवाल से हुई, लेकिन धीरे-धीरे वह सरकार और समाज के रिश्ते का आईना बन गया। जब मासूम छात्र-छात्रों पर लाठियां बरसीं, तब चोट केवल उनके शरीर पर नहीं लगी, लोकतंत्र की आत्मा पर भी लगी। सत्ता शायद यह भूल गई थी कि लाठी डर पैदा कर सकती है, सम्मान नहीं। डर से शासन चल सकता है, विश्वास नहीं।
यह भी कम विचित्र दृश्य नहीं था कि आंदोलन को कुचलने की कोशिश केवल पुलिस ने नहीं की। सत्ता के आसपास घूमने वाले अनेक टीवी स्टूडियो भी मैदान में उतर आए। कुछ एंकरों ने पहले फैसला सुनाया, फिर बहस करवाई। आंदोलनकारी ‘देशद्रोही’ घोषित कर दिए गए, विदेशी फंडिंग की कहानियां गढ़ी गईं, लोकतांत्रिक असहमति को ‘अराजकता’ बताया गया। यह पत्रकारिता नहीं थी; यह सत्ता की प्रेस विज्ञप्ति का प्रसारण था।
लेकिन इस बार एक नया माध्यम सामने था, सोशल मीडिया। वहां कैमरे सरकार के नहीं, नागरिकों के हाथ में थे। वहां संपादक जनता थी। जो दृश्य टीवी स्क्रीन से गायब थे, वे मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे रहे थे। लाठियां भी दिख रही थीं, घायल छात्र भी दिख रहे थे और उनका धैर्य भी। यही वह क्षण था जब देश की चुप्पी टूटने लगी। अभिभावकों की चिंता आंदोलन में बदल गई और युवाओं का आक्रोश जनमत में।
लोकतंत्र में सरकारें केवल चुनाव नहीं हारतीं, वे नैतिक आधार भी खोती हैं। जब जनता को यह लगने लगे कि उसकी बात सुनने के बजाय उसे बदनाम किया जा रहा है, तब सत्ता का आत्मविश्वास धीरे-धीरे भय में बदलने लगता है। शायद यही कारण था कि सरकार को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। जो आंदोलन पहले नजरअंदाज किया जा रहा था, वही अंततः सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया।
शिक्षा महकमे के ‘प्रधान’ पद से धर्मेंद्र की विदाई केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है। वह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जनता के दबाव को अनंत काल तक नकारा नहीं जा सकता। लोकतंत्र में कुर्सी जनता देती है और जनता चाहे तो उसे वापस भी ले सकती है। यही लोकतंत्र का मूल संस्कार है।
लेकिन यहीं रुक जाना सबसे बड़ी भूल होगी। किसी मंत्री का जाना शिक्षा व्यवस्था के संकट का समाधान नहीं है। वर्षों से शिक्षा एक महंगी वस्तु बनती जा रही है। निजीकरण ने अवसर और असमानता के बीच की खाई को चौड़ा किया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। युवाओं का विश्वास बार-बार टूटता रहा है। ऐसे में केवल चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था तब बदलती है, जब नीति बदलती है और नीयत भी।
इस आंदोलन की दूसरी बड़ी उपलब्धि विपक्ष का मनोबल बढ़ाना है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष किसी सरकार का शत्रु नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होता है। यदि जनता की आवाज संसद तक पहुंचे तो सड़कें कम गरम होती हैं। लेकिन जब संसद ‘मौन’ और ‘बहरी’ हो जाए, तब सड़कें बोलने लगती हैं। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक क्रम है।
मीडिया के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। पत्रकार का धर्म सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, सत्य के साथ खड़ा होना है। भारतीय पत्रकारिता के भीष्म पितामह प्रभाष जोशी कहा करते थे कि पत्रकारिता का पहला दायित्व जनता के प्रति है, सरकार के प्रति नहीं। यदि मीडिया सत्ता का प्रवक्ता बन जाएगा, तो जनता अपना माध्यम स्वयं खोज लेगी। इस आंदोलन ने वही कर दिखाया।
सरकार के लिए भी यह क्षण सीख का है। लोकतंत्र में असहमति को राष्ट्रविरोध नहीं कहा जा सकता। विरोध लोकतंत्र का प्राण है। नागरिक प्रश्न पूछेगा, सरकार उत्तर देगी, इसी संवाद से लोकतंत्र जीवित रहता है। यदि हर असहमति पर ‘देशद्रोह’ का ठप्पा लगाया जाएगा, तो लोकतंत्र का शरीर भले बच जाए, उसकी आत्मा घायल हो जाएगी।
‘जेन जी’ ने अपना नागरिक धर्म निभाया है। उसने यह साबित किया कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है। अब बारी सरकार की है कि वह अपना राजधर्म निभाए। समाज को धर्म, जाति और नफरत की रेखाओं में बांटने के बजाय शिक्षा, रोजगार और समान अवसरों के आधार पर जोड़ने का प्रयास करे। शिक्षा को बाजार नहीं, भविष्य माने। युवाओं को संदेह की नजर से नहीं, विश्वास की दृष्टि से देखे।
आंदोलन का असली अर्थ किसी सरकार की हार या किसी दल की जीत नहीं है। उसका अर्थ है लोकतंत्र का फिर से सांस लेना। यदि इस चेतना से व्यवस्था में सुधार आता है, शिक्षा अधिक न्यायपूर्ण होती है और सरकार जनता की आवाज को सम्मान देना सीखती है, तभी इस संघर्ष का उद्देश्य पूरा माना जाएगा।
लोकतंत्र की किताब में यह अध्याय अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह तो केवल पहली घंटी है। आगे की कहानी सरकार भी लिखेगी, विपक्ष भी और सबसे अधिक वह युवा पीढ़ी लिखेगी, जिसने यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र की अंतिम अदालत आज भी जनता ही है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं









