





गोपाल झा
बरसात का पानी कभी किसी शहर का दुश्मन नहीं होता। वह तो प्रकृति का संदेश लेकर आता है। दुश्मन वह व्यवस्था होती है जो हर साल उसी संदेश को अनसुना कर देती है। हनुमानगढ़ में हुई लगभग 80 मिमी बारिश ने फिर साबित कर दिया कि शहर पानी से नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक उदासीनता और सामाजिक चुप्पी से डूब रहा है।
शहर की तस्वीर देखिए। हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी हो या नई-पुरानी खुंजा, अंबेडकर चौक हो या गांधीनगर, टाउन की गलियां हों या सबसे महंगे प्लॉट वाला सिविल लाइंस, हर जगह पानी खड़ा है। विडंबना यह है कि जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक कार्यालय और न्यायालय परिसर के सामने तक जलभराव है। गांधीनगर अंडरपास बंद करना पड़ा। कई रास्तों पर आवागमन बाधित हो गया। सरकारी दफ्तर तक पहुंचना चुनौती बन गया। सवाल यह नहीं कि पानी कहां-कहां भरा। सवाल यह है कि आखिर ऐसा बचा क्या है जहां पानी नहीं भरा?
यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह मानव निर्मित संकट है। अगर 80 मिमी बारिश में जिला मुख्यालय की सांस फूल जाती है तो कल्पना कीजिए कि इससे अधिक वर्षा होने पर क्या होगा? क्या हर साल नागरिक इसी डर के साथ मानसून का इंतजार करेंगे? क्या बारिश का मतलब अब स्कूल बंद, सड़कें बंद, बाजार बंद और शहर ठप होना ही रह गया है?
सबसे दुखद बात यह है कि यह पहली बार नहीं हुआ। पिछले कई वर्षों से यही दृश्य दोहराया जा रहा है। हर बरसात से पहले नालों की सफाई के दावे होते हैं। नगर परिषद बजट खर्च करती है। बैठकें होती हैं। निरीक्षण किए जाते हैं। प्रेस नोट जारी होते हैं। लेकिन पहली अच्छी बारिश आते ही सारे दावे पानी में बह जाते हैं। इसका अर्थ साफ है, समस्या बारिश नहीं, व्यवस्था की नीयत और कार्यशैली है।
लोकतंत्र में जवाबदेही सबसे पहले जनप्रतिनिधियों की होती है। लेकिन यहां जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। सत्ता पक्ष सरकार की छवि बचाने और बनाने में व्यस्त है। विपक्ष को भरोसा है कि जनाक्रोश अंततः वोट के रूप में उसके खाते में ही आएगा। इसलिए समस्या का समाधान किसी की राजनीतिक प्राथमिकता नहीं है। दोनों पक्षों के बीच शहर कहीं पीछे छूट जाता है।
प्रशासन भी यह जानता है कि इस मुद्दे पर कोई गंभीर जनदबाव नहीं बनेगा। इसलिए हर साल अस्थायी उपाय ही पर्याप्त समझे जाते हैं। कहीं मोटर लगाकर पानी निकाल दिया जाएगा, कहीं मिट्टी डाल दी जाएगी, कहीं पंप चला दिए जाएंगे। कुछ दिन बाद पानी उतर जाएगा और उसके साथ जनता का गुस्सा भी। फिर अगले मानसून तक सब सामान्य मान लिया जाएगा।
लेकिन क्या केवल प्रशासन और राजनीति ही दोषी हैं? यह प्रश्न नागरिकों व समाज से क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए? हम सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालते हैं, वीडियो बनाते हैं, दो-चार तीखी टिप्पणियां लिखते हैं और फिर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। क्या कभी जलभराव वाले वार्डों के नागरिक संगठित होकर स्थायी समाधान की मांग करने निकले? क्या पार्षदों, पूर्व पार्षदों, अभियंताओं, वास्तुविदों और प्रशासन को एक मंच पर बैठाने का जनदबाव बना? लोकतंत्र केवल वोट डालने से नहीं चलता, लगातार सवाल पूछने से भी चलता है।
हनुमानगढ़ को आज तकनीकी समझ की जरूरत है। पूरे शहर की ड्रेनेज प्रणाली का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। पानी के प्राकृतिक बहाव को समझना होगा। जहां अतिक्रमण हैं, उन्हें हटाना होगा। जहां नालों की क्षमता कम है, उन्हें बढ़ाना होगा। नई कॉलोनियों की स्वीकृति से पहले जल निकासी की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यह काम अभियंताओं, नगर नियोजकों और स्थानीय अनुभव रखने वाले लोगों के संयुक्त प्रयास से होगा।
यह भी समय है कि वार्ड स्तर पर जनभागीदारी की नई परंपरा शुरू हो। जिस वार्ड में हर साल जलभराव होता है, वहां के वर्तमान और पूर्व पार्षद, स्थानीय नागरिक, व्यापारी और विशेषज्ञ मिलकर समाधान का प्रारूप तैयार करें। उसे नगर परिषद और जिला प्रशासन के सामने रखें। जब जनता संगठित होकर समाधान मांगती है, तब व्यवस्था को सुनना पड़ता है।
हनुमानगढ़ की पहचान उसकी मेहनतकश जनता है, उसकी जीवटता है। यह शहर रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों में भी खड़ा रहा है। विडंबना देखिए कि आज वही शहर पानी की कुछ घंटों की बारिश के आगे असहाय दिखाई देता है। यह असहायता प्रकृति ने नहीं दी, हमने अपने सामूहिक मौन से पैदा की है।
हर साल बारिश आएगी। पानी भी गिरेगा। सवाल यह नहीं कि बादल कब बरसेंगे। सवाल यह है कि क्या हमारी चेतना भी कभी बरसेगी? जिस दिन शहर अपने अधिकार के लिए उतनी ही गंभीरता से खड़ा होगा, जितनी गंभीरता से पानी उसकी सड़कों पर खड़ा होता है, उसी दिन हनुमानगढ़ डूबना बंद कर देगा। उससे पहले नहीं।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








