






ग्राम सेतु ब्यूरो.
दीपों की उजास, मंत्रोच्चार की पावन ध्वनि और लोकगीतों की मधुर स्वर लहरियों से जब सभागार गुंजायमान हुआ तो वातावरण मानो भारतीय लोकजीवन की आत्मा से भर उठा। मां के वात्सल्य, परिवार की संवेदनाओं और लोक संस्कृति की जीवंत परंपराओं को अभिव्यक्त करते गीतों ने उपस्थित विद्यार्थियों और शिक्षकों को भाव-विभोर कर दिया। कहीं लोरी की मधुरता थी तो कहीं जच्चा गीतों की आत्मीयता, कहीं घूमर और गणगौर की सांस्कृतिक छटा तो कहीं लोकजीवन के सहज भावों का अनुपम चित्रण। ऐसा लगा मानो भारतीय संस्कृति की सदियों पुरानी विरासत स्वयं स्वर बनकर उपस्थित हो गई हो।
दिग्दर्शक अध्ययन मंडल, प्रज्ञा प्रवाह जयपुर प्रांत तथा श्री अग्रसेन स्नातकोत्तर शिक्षा महाविद्यालय, केशव विद्यापीठ, जामडोली के संयुक्त तत्वावधान में प्री लोकमंथन कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत श्भारतीय लोकगीतों में मातृत्व के स्वरश् विषय पर परिसंवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप मंत्र के सामूहिक उच्चारण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।
दिग्दर्शक अध्ययन मंडल की संयोजक शिप्रा पारीक ने स्वागत उद्बोधन देते हुए भारतीय लोकगीतों के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृतियों, परंपराओं और जीवन मूल्यों के संवाहक हैं। इन्हीं के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक पहचान पीढ़ियों तक सुरक्षित रहती है।
परिसंवाद की चर्चा प्रवर्तक डॉ. रेखा रावत ने भारतीय लोकगीतों में निहित मातृत्व भाव की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने घूमर, गणगौर, विवाह, जच्चा और लोरी जैसे विभिन्न लोकगीतों के माध्यम से बताया कि भारतीय लोक परंपरा में मातृत्व केवल एक भाव नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन का आधार है। लोकगीत परिवार, समाज और संस्कृति को भावनात्मक रूप से जोड़ने का कार्य करते हैं।
डॉ. संजू शेखावत ने विद्यार्थियों के साथ संवाद स्थापित करते हुए जच्चा, पालना, हालरिया और घूघरी गीतों की सजीव प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित श्रोताओं को लोक संस्कृति की सहजता और आत्मीयता से परिचित कराया। विद्यार्थियों ने भी पूरे उत्साह के साथ सहभागिता करते हुए लोकगीतों के सांस्कृतिक महत्व को समझा।
इस अवसर पर प्रज्ञा प्रवाह, राजस्थान के क्षेत्र संयोजक कमलेश ने कहा कि लोकगीत किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना के सबसे सशक्त माध्यम होते हैं। उन्होंने इन अमूल्य धरोहरों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यदि नई पीढ़ी लोक परंपराओं से जुड़ेगी तो सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होगा। उन्होंने आगामी दिसंबर माह में जयपुर में आयोजित होने वाले लोकमंथन 2026 के उद्देश्य और स्वरूप की भी विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय के शिक्षक प्रमोद और सुनीता ने भी विभिन्न लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर वातावरण को सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया। उनकी प्रस्तुतियों को उपस्थित जनों ने सराहना के साथ सुना।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य रीटा शर्मा ने लोकगीतों की भावात्मक प्रस्तुति के माध्यम से विद्यार्थियों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि लोकगीत हमारी सांस्कृतिक स्मृति के जीवंत दस्तावेज हैं, जिनका संरक्षण प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है। उन्होंने सभी अतिथियों का अभिनंदन करते हुए आयोजकों के प्रयासों की सराहना की।
परिसंवाद के उपरांत महाविद्यालय परिसर में पौधारोपण किया गया। इस अवसर पर उपस्थित सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों और अतिथियों ने पर्यावरण संरक्षण तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन का सामूहिक संकल्प भी व्यक्त किया।






