



आर्किटेक्ट ओम
इन दिनों हमारी मंडियों और बाजारों में किसानों तथा आम देहाती लोगों को लू से बचने के लिए सिर पर साफा डाले या बाँधे देखना बड़ी ही आम बात है। पगड़ीधारी सिख किसान भी बहुतायत से मंडियों और बाजारों में दिखाई देते हैं।
बैसाख और जेठ की दोपहर की सीधी, तीखी धूप तथा लू में शीतल पेय के बाद साफा ही लू से बचने का बड़ा सहारा है। समाज विज्ञान के शोध भी बताते हैं कि होमो सेपियंस ने विकास और तकनीक को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया है। यह बात वजनदार भी लगती है और जायज़ भी।
इन दिनों मेरे इलाके की मंडियाँ गेहूँ की फसल से अटी पड़ी हैं। हाड़ी और सावणी की फसलों के दिनों में, जब किसानों की उपज पीड़ों पर आती है, तब मंडियों का माहौल बड़ा जीवंत हो जाता है। हमारा तो इलाका ही बड़ा रंगला इलाका है। थार के मरुस्थल के बड़े-बड़े टीलों से निकलकर मैदानों की ओर कदमताल करता हुआ यह भूभाग आगे पंजाब और हरियाणा की सीमाओं से इश्क़-मिज़ाजी करता प्रतीत होता है।
यह इश्क़-मिज़ाजी केवल यहाँ के भूगोल में ही नहीं दिखती, बल्कि यहाँ के लोक-परिवेश में भी इसकी झलक दिखाई देती है। यहाँ की बोली में बागड़ी, मलवई पंजाबी और थोड़ी-सी हरियाणवी का सम्मिश्रण है। यह मिश्रण यहाँ के परिवेश में भी है और लोगों के मिजाज़ में भी। मूलतः यह खेती-किसानी वाला इलाका है और यहाँ की मंडियों तथा कस्बानुमा शहरों का समूचा अर्थशास्त्र और व्यापार हाड़ी तथा सावणी की इन दो फसलों के इर्द-गिर्द घूमता है,नहरी सिंचाई तंत्र भी विकसित है यहां।
फसलें अच्छी हो जाएँ और किसानों को उनका उचित भाव मिल जाए, तो यहाँ के बाजारों में गतिशीलता और रौनक लौट आती है। इन्हीं हाड़ी के दिनों में गाँव और मंडियाँ गुरुद्वारों के लंगर-प्रसाद के लिए गेहूँ की पूर्ति करते हैं। साथ ही, गाँवों और मंडियों में बनी गोशालाओं के लिए तुड़ी के रूप में चारे की व्यवस्था भी होती है, जिसमें किसान खुले दिल से सहयोग करते हैं।
गाँव-देहात में एक लोक-कहावत आम बोलचाल में दोहराई जाती है। किसान बीज डालते समय प्रकृति की ओर देखकर कहता है, ‘चिड़ियों और जीव-जंतुओं के लिए भी देना, और मेरे लिए भी।’
कोई भी वर्तमान और भूतकाल के धरातलीय हालातों को उस समय के अखबारों, सोशल मीडिया और समाचारों के सहारे देख सकता है कि हाड़ी और सावणी की फसलों के पकने पर किसानों को अपने साफे सिर पर बाँधकर प्रशासन की देहरी पर आकर आंदोलित होना पड़ता है। फसलों के भाव और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए, सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो, यह स्थिति लगभग समान ही बनी रही है।
कई बार लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में किसानों की पगड़ियों और साफों की रंगीनियों की बलि दे दी गई है। किसानों के लिए बनाई गई नीतियों, उनके आंदोलनों और सरकारों के साथ होने वाली वार्ताओं में यह पीड़ा स्पष्ट झलकती है।
कोविड का संकट हो या हाल के खाड़ी क्षेत्र के युद्धों से उपजा तेल और गैस संकट, बड़े शहरों से वापस गाँव-देहात लौटते कामगारों को राहत अंततः इन्हीं साफा बाँधे किसानों के बीच आकर मिली। जब शहर उन्हें जीवन-यापन के संकट के समय रोक नहीं पाए, तब गाँव और गांव किसान ही उनके संबल बने,चाहे उनके सारे आर्थिक हित तो पूरे नहीं होते पर समाजिक, थोडी आर्थिक और समाजिक मनोविज्ञान वाली सुरक्षा उन्हें गांव देहात और उसका कृषि तंत्र दे पाता है।
ऐसा क्यों होता है?
एक नज़र हम आँकड़ों पर भी डाल लेते हैं। भारत, चीन और अमेरिका की जनसंख्या विश्व जनसंख्या में क्रमशः लगभग 18 फीसद, 17 फीसद और 4 फीसद हिस्सा रखती है, जबकि विश्व के कुल निर्यात में इनका हिस्सा लगभग 2 फीसद, 14 फीसद और 8 फीसद है। बस, इन्हीं दो आँकड़ों में शहरों से गाँवों की ओर होने वाले रिवर्स पलायन का राज बहुत हद तक छिपा है। कहीं न कहीं ऐसा इसलिए है कि हमारे पास गाँव-देहात से शहर आए लोगों के लिए पर्याप्त और ठोस रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता। जो रोजगार बनता भी है, उससे लोगों को इतना आर्थिक लाभ नहीं होता कि वे परिवार सहित शहरों में टिक सकें और अपने परिवार के लिए स्थायी छत का प्रबंध कर सकें।
विकसित देश औद्योगीकरण में हमसे मीलों आगे हैं और अब एआई भी मशीनों तथा फैक्टरियों से मजदूरों और कामगारों को बाहर कर रहा है। आगे यह गति और बढ़ने की संभावना है। देश का पेट भरने के लिए अन्न उपजाने और तन ढकने के लिए कपास पैदा कर देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले किसानों को यह कैसी सज़ा मिल रही है, जो साल-दर-साल उनके लिए और अधिक क्रूर होती जा रही है? क्या हमारे लिए अब गांधी के ग्राम स्वराज की उस अवधारणा पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है, जिसमें गाँव अपने आप में आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सशक्त इकाई हों? गाँव-देहात में किसानों के खेतों को आर्थिक ताकत देने वाले छोटे और कुटीर उद्योग विकसित किए जाएँ, जो वहीं के लोगों को रोजगार और समृद्धि प्रदान कर सकें।
एक और बात भी है। हम गाँव-देहात खाली करवाकर इतनी बड़ी आबादी को कुछ बड़े महानगरों की श्रृंखला में ले जाकर तथा देश के शेष भूभाग को लगभग खाली करवाकर आखिर हासिल क्या करेंगे? यह प्रश्न केवल किसानों या गाँवों का नहीं है, बल्कि उस विकास-दृष्टि का भी है जिसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। शायद इसी व्यापक मानवीय सरोकार की ओर शहीदे आज़म भगतसिंह नें कहा था कि ‘देश-दुनिया में कहीं भी मानव प्रभावित होता है तो सरोकार मुझको।’
गाँव, किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और आम नागरिक, ये किसी अलग-अलग दुनिया के हिस्से नहीं हैं। एक के संकट का प्रभाव अंततः पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए किसानों की समस्याओं पर विमर्श केवल कृषि का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न भी है। तो जाहिर है, इन तपती दोपहरियों में किसानों के रंगले साफे आबाद रहें, पर सोचना तो बनता है।







