





ग्राम सेतु ब्यूरो.
हनुमानगढ़ जिले में मंगलवार यानी 14 अप्रैल बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम रहा। शहीद स्मारक परिसर में भी जुटी भीड़ केवल औपचारिकता निभाने नहीं आई थी, बल्कि आंखों में जिज्ञासा और मन में सवाल लिए लोग संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उनके विचारों को आज के संदर्भ में समझने आए थे। बाबा साहेब के चित्रों और उत्साहपूर्ण माहौल के बीच ‘बाबासाहेब के विचार: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कितने प्रासंगिक’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी ने पूरे वातावरण को बौद्धिक ऊर्जा से भर दिया। यह कोई भाषणबाजी का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सोचने और खुद से सवाल करने का मंच था, और यही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि भी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार गोपाल झा ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने दो टूक कहा कि बाबा साहेब को केवल वंचित या आरक्षित समाज तक सीमित करना उनके विचारों के साथ अन्याय है। उनका संघर्ष और चिंतन पूरे मानव समाज के लिए है। उन्होंने संविधान के तीन मूल स्तंभ-समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर जोर देते हुए कहा कि आज इन मूल्यों की सबसे अधिक जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान को पूजने से ज्यादा जरूरी है उसे व्यवहार में उतारना, क्योंकि कागज पर लिखे अधिकार तब तक अर्थहीन हैं, जब तक वे जमीन पर दिखाई न दें।
वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. बृजेश कुमार अग्रवाल ने अपने मुख्य वक्तव्य में संविधान और मूल अधिकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब द्वारा दिए गए मूल अधिकार महज कानूनी प्रावधान नहीं हैं, बल्कि सामाजिक न्याय की बुनियाद हैं। उन्होंने चेताया कि अधिकारों के प्रति जागरूकता के बिना लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा। जब तक नागरिक अपने अधिकारों को जानेंगे नहीं, तब तक समानता केवल भाषणों में ही रहेगी।
वरिष्ठ साहित्यकार वीरेंद्र छापोला ने शिक्षा के अधिकार पर अपने विचार रखते हुए कहा कि बाबा साहेब ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उन्होंने बाबा साहेब के जीवन संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और यह साबित किया कि शिक्षा ही असली शक्ति है। छापोला ने दो टूक कहा कि आज भी वंचित वर्गों के लिए शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है,बिना शिक्षा के समानता की बात खोखली है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. संतोष राज पुरोहित ने बाबा साहेब के उस पक्ष को सामने रखा, जिस पर अक्सर कम चर्चा होती है, उनकी अर्थशास्त्र पर गहरी पकड़। उन्होंने कहा कि अंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं, बल्कि एक कुशल अर्थशास्त्री भी थे। उनके आर्थिक विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, खासकर समावेशी विकास और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के संदर्भ में। उन्होंने साफ कहा कि अगर नीति-निर्माण में अंबेडकर की आर्थिक सोच को गंभीरता से लिया जाए, तो कई सामाजिक असंतुलन अपने आप दूर हो सकते हैं।
दलित साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. रामकुमार जोईया ने कहा कि बाबा साहेब के दौर का साहित्य सामाजिक जागरूकता का सशक्त माध्यम था। उन्होंने बताया कि उस समय का साहित्य समाज में व्याप्त असमानताओं को बेनकाब करता था और लोगों को सोचने पर मजबूर करता था। वह साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, बस जरूरत है कि नई पीढ़ी उसे पढ़े और समझे।
शहीद स्मारक के संस्थापक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शंकर सोनी ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में जागरूकता बढ़ाने और बाबा साहेब के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि युवाओं के लिए शहीद स्मारक पर ऐसे कार्यक्रम आगे भी नियमित रूप से आयोजित किए जाएंगे।
कार्यक्रम का संचालन शिक्षाविद हरजिंदर सिंह सैनी ने कुशलतापूर्वक किया। मंच पर राधेश्याम टाक, मोहन लाल शर्मा, सुशील भाकर, आशीष गौतम, नरेंद्र यादव, वरिष्ठ पत्रकार पृथ्वीराज शर्मा ‘शूरवीर’, प्रदीप गोठवाल, योगेश कुमावत, विक्रम दूधवाल, योगी, आकाश, वारिस अली, मुश्ताक खान, हीना, समीक्षा, बबीता, कोमल, मनीषा सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और युवा मौजूद रहे।
कार्यक्रम का समापन बाबा साहेब के विचारों को आत्मसात करने और उन्हें जीवन में उतारने के संकल्प के साथ हुआ। साफ संदेश था, अंबेडकर को याद करना आसान है, उनके रास्ते पर चलना ही असली चुनौती है।






