







एडवोकेट शंकर सोनी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की लाठियां बरसती हैं, तो हर जागरूक नागरिक के मन में यह सवाल उठता है कि पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए है या सत्ता के इशारे पर हमें प्रताड़ित करने के लिए? जनता की रक्षक दिखने वाली पुलिस अक्सर सत्ता के दमनकारी औजार के रूप में क्यों नजर आती है? इसका मूल कारण किसी एक अधिकारी का आचरण नहीं, बल्कि वह औपनिवेशिक ढांचा है जिसे आजादी के सात दशक बाद भी हमने जस का तस ढो रखा है।
सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने भारत का सीधा नियंत्रण अपने हाथों में लिया। भविष्य में किसी जन-आंदोलन या क्रांति को कुचलने के उद्देश्य से 1861 का पुलिस अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियम की धारा 3 के तहत पुलिस पर वायसराय और गवर्नर जनरल का पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया गया।
आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में व्यवस्था तो बदली, पर सोच नहीं। 1861 के कानून में केवल ‘गवर्नर जनरल’ की जगह श्स्टेटश् (राज्य सरकार) शब्द जोड़ दिया गया। कानून की मूल आत्मा वही दमनकारी बनी रही। नतीजा यह हुआ कि पुलिस ब्रिटिश सत्ता के स्थान पर अब चुनी हुई सरकारों के प्रति उत्तरदायी हो गई। हमें जिस श्पब्लिक पुलिसश् की आवश्यकता थी, जो संविधान और ‘वी द पीपुल’ के प्रति जवाबदेह हो, वह व्यवस्था व्यवहार में केवल ‘स्टेट पुलिस’ (शासक की पुलिस) बनकर रह गई।
वर्तमान समय में राजनीति के अपराधीकरण ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। पुलिस अधिकारियों के तबादले, पदस्थापना और पदोन्नति का नियंत्रण जब स्थानीय विधायकों और मंत्रियों के पास आ जाता है, तो वर्दी की निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। जब शीर्ष अधिकारी राजनीतिक आकाओं की परिक्रमा करने लगें, तो थानों में तैनात ईमानदार अधीनस्थ अधिकारियों का मनोबल टूटना तय है। नतीजतन, पुलिसिंग का लक्ष्य अपराध रोकना नहीं, बल्कि सत्ताधीशों की प्राथमिकताओं और उनके स्वार्थों को साधना बन जाता है।
पुलिस सुधारों की रूपरेखा दशकों पहले तैयार कर ली गई थी, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे फाइलों से बाहर नहीं आ सके। आपातकाल के बाद गठित धर्मवीर आयोग ने अपनी 8 विस्तृत रिपोर्टों में स्पष्ट कहा था कि पुलिस के दैनिक कामकाज व तबादलों से राजनीतिक दखल खत्म किया जाए। आयोग ने जांच और कानून-व्यवस्था को अलग करने तथा बल को स्वायत्त व जवाबदेह बनाने की मजबूत वकालत की। सरकारों ने इन क्रांतिकारी सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की जनहित याचिका पर सर्वाेच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 7 अनिवार्य निर्देश जारी किए। इनमें राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डीजीपी व प्रमुख अधिकारियों का न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल, पुलिस स्थापना बोर्ड की स्थापना, जांच व कानून-व्यवस्था का पृथक्करण और पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन शामिल था।
सर्वाेच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अधिकांश राज्य सरकारों ने इन सुधारों को कमजोर करके लागू किया। ट्रांसफर-पोस्टिंग आज भी राजनीतिक दबाव का मुख्य जरिया है और जांच एजेंसियों का उपयोग अक्सर विरोधियों को दबाने के लिए किया जाता है।
पुलिस सुधार केवल किसी विभाग की प्रशासनिक पुनर्संरचना नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक के मौलिक अधिकारों, मानवीय गरिमा और लोकतंत्र के अस्तित्व से जुड़ा विषय है। जब तक पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त कर कानून के प्रति जवाबदेह एक पेशेवर और स्वायत्त बल नहीं बनाया जाएगा, तब तक ‘सुशासन’ का दावा कागजी ही रहेगा। धर्मवीर आयोग की सिफारिशों और शीर्ष अदालत के निर्देशों को अक्षरशः लागू करना अब विकल्प नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अनिवार्यता है।






