




शंकर सोनी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम केवल क्रांतिकारी नहीं, बल्कि राष्ट्र के स्वाभिमान के प्रतीक बन चुके हैं। शहीद उधम सिंह ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए 21 वर्षों तक अपने संकल्प को जीवित रखा। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक शहीद को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति को नमन करना है, जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि अत्याचार का हिसाब इतिहास अवश्य लेता है।
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग रॉलेट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए थे। अंग्रेजी शासन ने बिना किसी चेतावनी के ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियां बरसा दीं। बाग का एकमात्र निकास बंद कर दिया गया, जिससे लोग जान बचाने के लिए दीवारें फांदने लगे, जबकि अनेक लोग गोलियों से बचने के लिए कुएं में कूद गए। इस निर्मम नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया।
कहा जाता है कि इस हृदयविदारक घटना के प्रत्यक्षदर्शियों में युवा उधम सिंह भी शामिल थे। उन्होंने वहीं जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर प्रण किया कि इस अत्याचार के जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे तक पहुंचाएंगे। यही संकल्प उनके जीवन का लक्ष्य बन गया।
26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे उधम सिंह का बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। उनका वास्तविक नाम शेर सिंह था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया और कुछ वर्षों बाद बड़े भाई का भी निधन हो गया। अनाथालय में पले इस युवक ने जीवन की कठिनाइयों के आगे हार नहीं मानी, बल्कि स्वयं को देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया।
उधम सिंह गदर पार्टी से जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर पांच वर्ष का कारावास भी दिया। इसी दौर में उनका संपर्क भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों से हुआ। भगत सिंह के विचारों और साहस ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने पहचान बदलकर विदेशों की यात्रा की और अपने लक्ष्य की दिशा में तैयारी जारी रखी।
उधम सिंह का निशाना केवल जनरल डायर ही नहीं, बल्कि तत्कालीन पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओश्ड्वायर भी थे, जिसकी नीतियों ने जलियांवाला बाग जैसी त्रासदी को जन्म दिया। हालांकि बीमारी के कारण जनरल डायर की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उधम सिंह ने माइकल ओश्ड्वायर को उसके अपराध की सजा देने का निश्चय नहीं छोड़ा।
13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्स्टन हॉल में आयोजित एक सभा में माइकल ओश्ड्वायर भाषण देने पहुंचा। उधम सिंह एक पुस्तक के भीतर रिवॉल्वर छिपाकर सभा में दाखिल हुए। कार्यक्रम समाप्त होते ही उन्होंने ओश्ड्वायर पर गोलियां दाग दीं और वर्षों पुराना संकल्प पूरा कर दिया। घटना के बाद उन्होंने भागने का प्रयास नहीं किया और स्वयं गिरफ्तारी दी।
ब्रिटिश अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। अंतिम क्षण तक उनके चेहरे पर न भय था, न पछतावा। उनके लिए राष्ट्र का सम्मान व्यक्तिगत जीवन से कहीं अधिक बड़ा था। वर्ष 1974 में ब्रिटेन ने उनके पार्थिव अवशेष भारत को सौंपे, जहां पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
शहीद उधम सिंह का जीवन केवल प्रतिशोध की कहानी नहीं, बल्कि न्याय, आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति का अमर संदेश है। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि स्वतंत्रता केवल शब्द नहीं, बल्कि उसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का साहस भी चाहिए। उनकी पुण्यतिथि हमें याद दिलाती है कि देश की आजादी असंख्य बलिदानों की विरासत है, जिसे हर पीढ़ी को सम्मान और कृतज्ञता के साथ स्मरण रखना चाहिए।








