




वेदव्यास
साहित्यपुरुष प्रेमचंद को मैं अपना मित्र, अपना विचार और अपना सरोकार मानता हूं। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि भारत आज भी भूखे-नंगे किसानों, मेहनतकश मजदूरों, सामंती सोच, सांप्रदायिक विभाजन, जातीय भेदभाव और महिला उत्पीड़न जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। उनका साहित्य इन समस्याओं के बीच समता, न्याय और मानवीय संवेदना की तलाश करता है।
प्रेमचंद की हर रचना आज भी मुझसे एक सवाल पूछती है, ‘कलम के सिपाही’ के रूप में तुम किसके साथ खड़े हो? यही प्रश्न उनके साहित्य को कालजयी बनाता है। भारतीय साहित्य में जिस तरह सूरदास, कबीर और तुलसीदास की मानवीय चेतना दिखाई देती है, उसी का आधुनिक स्वर प्रेमचंद के साहित्य में सुनाई देता है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र, स्वामी विवेकानंद और सुब्रह्मण्य भारती की तरह प्रेमचंद भी भारतीय समाज की चेतना के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और देश-विदेश की कई पीढ़ियों को प्रेरित करता है।
प्रेमचंद जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय संकीर्णताओं से ऊपर उठकर एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जहां समानता, न्याय और मानवता सर्वाेच्च मूल्य हों। उनका मानना था कि भारत की असली शक्ति उसके किसान और मजदूर हैं। यही विचार उनकी अधिकांश रचनाओं की आत्मा है।
‘गोदान’ पढ़ने पर समझ आता है कि किसान आज भी संकट में क्यों है। वहीं ‘महाजनी सभ्यता’ आज की आर्थिक व्यवस्था, निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभावों को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। प्रेमचंद ने जिस महाजनी मानसिकता की आलोचना की थी, उसका नया रूप आज भी समाज और अर्थव्यवस्था में दिखाई देता है।
प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत थे। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक होना चाहिए। यही विचार आज भी साहित्य की सबसे बड़ी कसौटी है।
उनका लेखन 1901 में शुरू हुआ। शिक्षा विभाग में कार्यरत रहते हुए भी उन्होंने अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों का विरोध अपनी लेखनी से किया। ‘सोजे-वतन’ से लेकर ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ और ‘मंगलसूत्र’् तक उनकी रचनाएं भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज हैं।
महज 56 वर्ष की आयु में 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका साहित्य आज भी जीवित है। उनके पुत्र अमृतराय की पुस्तक ‘कलम का सिपाही’् प्रेमचंद के व्यक्तित्व और संघर्ष को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
आज प्रेमचंद की रचनाओं का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी कहानियों पर अनेक फिल्में बनी हैं। भारतीय समाज को समझने और सामाजिक न्याय की लड़ाई को दिशा देने में उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
जब तक भारत में शोषण, असमानता और अन्याय मौजूद रहेंगे, तब तक प्रेमचंद हमारे विचारों और चेतना में जीवित रहेंगे। नए भारत के निर्माण के लिए उनके साहित्य और सामाजिक सरोकारों को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।
-लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं








